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दिल्ली चुनाव को मुद्दें प्रभावित करेंगे या सरकार के कामकाज

देश में जब-जब भी चुनाव आते है तब – तब नये मुद्दे उभर आते है। इस तरह के मुद्दे राजनीतिक प्रभाव वाले ज्यादातर होते है जो देखने व सुनने में तो बहुत अच्छे लगते है पर इनमें राजनीतिक स्वार्थ ज्यादा ही समाहित होता है। जिसके परिणाम कभी- कभी जन विरोधी भी दिखाई देने लगते। उतर प्रदेश चुनाव से पूर्व देश में नोट बंदी का मुद्दा देश में उभरा जिसकी कोई खास जरूरत नहीं थी पर उतर प्रदेश के चुनाव में राजनीतिक लाभ अवश्य मिला। सभी जानते है कि चुनाव में काले धन का उपयोग चुनाव जीतने में काम आता रहा है जिसपर अचानक नोटबंदी के चलते ब्रेक लग गया।

विपक्ष की कमर टूट गई ओर इसका सीधा राजनीतिक लाभ नोटबंदी लाने वाले राजनीतिक दल को मिला जिसकी सरकार पूर्ण बहुमत से बन गई। इस नोटबंदी से देश में कालाधन का आना तो बंद हुआ नहीं, उल्टे दो नम्बर की उगाही जरूर हुई। बैंक के कई अधिकारी इसके उलट फेर के गणित में रातों रात मालोंमाल हो गये। इस नोटबंदी से देश के अमीर वर्ग को तो कोई फर्क नहीं पड़ा पर देश का अम वर्ग अवश्य परेशान रहा। अपने ही नोट को बैंक से लेने में कई पापड़ बेलने पड़े। छोटे,- मझौले उद्योग, व्यापार पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ा। सबसे ज्यादा देश का रिएल स्टेट पभावित हुआ। दिहाड़ी मजदूरों की मजदूरी छिन गई। इस नोटबंदी के परिप्रेक्ष्य में जो चुनाव में राजनीतिक लाभ लेने की मंशा नोटबंदी लाने वाले राजनीतिक दल की योजना में शामिल रही वह अवश्य पूरी हो गई, भले आमजन को इससे परेशानी हुई हो। नोटबंदी इससे पहले भी देश में लागू हुई पर उससे आमजन को कोई परेशानी नहीं हुई। दूसरा मुद्दा आतंकी हमले के खिलाफ कार्यवाही का रहा जो उचित भी रहा और इसका भी चुनाव में पूरा राजनीतिक लाभ मिला।

फिर मुद्दा उभरा है नागरिकता को लेकर जिसका राजनीतिकरण उभरता नजर आ रहा है। इस पहलू पर पक्ष -विपक्ष दोनों की राजनीति साफ – साफ दिखाई दे रही है। सत्ता पक्ष इसे अपनी चुनावी घोषणा का अंग मानकर अमल करने के प्रयास में लगा हुआ है तो विपक्ष इसे गलत ठहराकर भुनाने की राजनीति में सक्रिय दिखाई दे रहा है। झारखंड का चुनाव तो इस परिवेश से बाहर हो गया अब दिल्ली का चुनाव सामने है जहां एक तरफ वर्तमान दिल्ली सरकार के पांच वर्ष के कार्यो का लेखा – जोखा जनता के समक्ष है तो दूसरी ओर विपक्ष में खड़े राजनीतिक दलों का वर्तमान सरकार को विफल बताने का प्रयास। इस कड़ी में उभरते शहीन बाग जैसे अनेक तरह के मुद्दे जो आम जन को अपने पक्ष में लाने का कार्य भी कर रहे है। अब देखना है कि दिल्ली विधान सभा चुनाव को मुद्दे कितना प्रभावित कर पाते है। इस चुनाव के बाद देश में अन्य राज्यों के भी चुनाव होंगे जहां चुनाव पूर्व नये मुद्दे उभर कर सामने जरूर आयेंगे। इन उभरे मुद्दो के बीच आम जनता कितना उलझ पाती है यह तो समय हीं बतायेगा पर सत्ता की दौड़ में इस तरह की राजनीति होती हीं रहेगी, जिसे देशहित में कदापि नहीं कहा जा सकता।

वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा लिये गये कुछ निर्णय जिनमें देश को सामरिक दृष्टि से रक्षा क्षेत्र में मजबूती, पाक को करारा जबाब, जम्मू – कश्मीर में धारा 370 हटाना एवं केन्द्र शासित राज्य स्थापित कर आतंकवाद के बढ़ते कदम पर रोक लगाने के प्रयास , तीन तलाक कानून में परिवर्तन कर प्रताड़ित मुस्लिम महिलाओं को राहत पहुंचाने ,पड़ौसी देश से विस्थापित नागरिकों को देश की नागरिकता देने का कार्य निश्चित रूप से सराहनीय एवं देशहित में है। इससे जुड़े मुद्दे चुनाव में उभरेंगे , राजनीतिक लाभ भी मिल सकता है। दिल्ली की आप सरकार भी अपने पांच वर्ष में किये कार्य आम जन को सुरक्षा मुहैया कराने, 200 यूनिट बिजली, पानी, चिकित्सा एवं बसों में महिलाओं की यात्रा फ्री के साथ -साथ 40हजार वरिष्ठ जनों को निशुःल्क तिर्थ यात्रा कराने तथा शिक्षा में पहले से बेहतर सुधार लाकर सरकारी शिक्षण संस्थान से 400 विद्यार्थियों के सीधे आई आई टी संस्थान में चयन कराने के दावे के साथ पुनः सत्ता में वापसी का दावा कर रही है। एक तरफ दिल्ली की वर्तमान आप सरकार तो विपक्ष में सभी दल।

अब देखना ये है कि दिल्ली विधान सभा चुनाव को विशेष रूप से कौन से पक्ष प्रभावित कर पायेंगे। विपक्ष के आरोपित बोल,भाजपा के राष्ट्रवाद के नारे, फ्री वायदे,सीएए को लेकर दिल्ली में उभरी वर्तमान परिस्थियां सरकार के द्वारा बताये जा रहे कामकाज।

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