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यह दशक बुजुर्गों की स्वस्थ देखभाल और सुरक्षा को हो समर्पित

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(भूपेश दीक्षित, जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ)
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भारत ने पिछले दो दशकों में स्वास्थ्य सूचकांको में प्रगतिशील सुधार कार्य किया है। फिर चाहे शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर व प्रजनन दर में लगातार कमी लाना हो या फिर टीकाकरण व संस्थागत प्रसव में लगातार वृद्धि प्राप्त करना हो यह सभी स्वास्थ्य सूचकांक भारत की स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राप्त सफल उपलब्धियां दर्शाते है। किन्तु इन सबके बीच बुजुर्गों की स्वस्थ देखभाल और उनसे जुड़ी समस्याओं के मामलों में देश को संभलने व ध्यान देने की आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में कम से कम 14.2 करोड़ वृद्ध व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है। इस दशक के शुरुआत में ही वृद्धजनों के स्वास्थ्य से लेकर जनसांख्यिकी और सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण तक को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा ‘बढ़ती उम्र की लम्बे समय निगरानी’ (लासी) नामक अध्ययन रिपोर्ट जारी की गयी है जो देश के नीति निर्माताओं के लिए स्वास्थ्य और उम्र बढऩे के मुद्दों पर नीतिगत निर्णय लेने के लिए वैज्ञानिक प्रमाणों का भंडार प्रदान करवाती है साथ ही साथ रिपोर्ट बुजुर्गों की स्वस्थ देखभाल और सुरक्षा के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाती है।

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रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 में जनसँख्या जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 10.4 करोड़ बुजुर्ग व्यक्ति (60 साल या उससे से अधिक उम्र के) है, जिनमे से 5.3 करोड़ महिलाएं और 5.1 करोड़ पुरुष है। सरकार के अनुसार देश में 3 प्रतिशत सालाना दर से बढऩे वाली बुजुर्गों की जनसँख्या वर्ष 2030 के अंत तक 32 करोड़ तक पहुँच जायेगी । विश्वभर में जहाँ एक ओर चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान के सहारे लोगों की जीवन प्रत्याशा में इजाफा हो रहा है वहीं दूसरी ओर बुजुर्गों में मानसिक एवं शारीरिक बीमारियां भी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में देश में बुजुर्गों को संभालना एक बड़ी चुनौती होगी।

लासी रिपोर्ट के अनुसार देश में 7.5 करोड़ बुजुर्ग व्यक्ति कोनिक (पुरानी) बीमारीयों से ग्रसित है यानी कि देश में 60 साल से अधिक उम्र के दो में से एक बुजुर्ग व्यक्ति हृदय रोग, मधुमेह, रक्तचाप, फेफड़ों के संक्रमण, हड्डी व जोड़ से सम्बंधित रोग, मस्तिष्क सम्बन्धी विकार, मनोविकार आदि पुरानी बीमारीयों से ग्रसित है। रिपोर्ट के अनुसार भारत का हर तीसरा बुजुर्ग व्यक्ति अवसाद में है। बुजुर्ग पुरुषों के मुकाबले बुजुर्ग महिलाओं में अवसाद अधीक है। ग्रामीण क्षेत्रों में 9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाले 6 प्रतिशत बुजुर्ग व्यक्ति गंभीर अवसाद में है। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की एडीएसआई, 2019 रिपोर्ट के अनुसार भारत में 60 साल या उससे अधिक उम्र के लगभग 30 बुजुर्ग व्यक्ति प्रतिदिन अपनी जीवन लीला समाप्त कर रहे है। उपरोक्त सभी रिपोर्टस और आंकड़ोंं का अध्ययन व समीक्षा करने से एक बात तो साफ है कि देश में बुजुर्गों के बिगड़ते स्वास्थ्य, देखभाल और सुरक्षा को किसी भी हालत में नजरंदाज नहीं किया जा सकता। भारत में तो वृद्धजनों के आशीर्वाद के प्रताप के बारे में कहा भी गया है कि अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम।।

बुजुर्गों की अस्वस्थता, अशक्तता, आर्थिक एवं सामाजिक असुरक्षा को लेकर देश में गंभीर समस्याएं तेजी से उभर रही है तो देश को भी उसके समाधान पर भी दुगनी गति से कार्य करने की आवश्यकता है। बुजुर्गों को सामाजिक देखरेख प्रदान कराने के लिए देश जापान मॉडल से सीख ले सकता है। इसी प्रकार जियोकोडेड मैप्स, सेंसर बॉक्स और तकनीक के माध्यम से कैसे बुजुर्गों के लिए स्मार्ट और सेफ सिटी का निर्माण बिना किसी पक्षपात के कैसे किया जा सकता है इसकी सीख भारत शिकागो मॉडल से ले सकता है। वृद्ध लोगों की कार्यात्मक क्षमता की डिजिटल तकनीक के माध्यम से जानकारी जुटाते हुए तथा उसका उपयोग वृद्ध व्यक्तियों को गृहस्तरीय देखभाल सुविधा प्रदान करवाने का मॉडल भारत तंजानिया से सीख सकता है। वृद्धजनों की स्वस्थ उम्र बढ़ाने के लिए उनमें पारिवारिक और सामुदायिक स्तर पर कार्यात्मक क्षमता विकसित करना व उस प्रक्रिया को उनके कल्याण के लिए निरंतर सक्षम बनाये रखने का मॉडल भारत मलेशिया से सीख सकता है।

सेवानिवृति के बाद बुजुर्गों को किसी भी प्रकार के नशे से दूर रखते हुए तथा उनको सक्रिय रूप से समाज के उत्थान व कल्याण के लिए उपयोग में लेना और साथ बुजुर्गों को आर्थिक रूप से सशक्त रखने के लिए भारत अपने पारंपरिक गुरुकुल मॉडल को सुदृढ़ करके कर सकता है जिसका नया स्वरुप हमें देश में ही नॉएडा व राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में देखने को मिलता है जहाँ सेवानिवृत फौजी भाई और शिक्षक आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों के बच्चों का भविष्य उज्जवल बनाने में निरंतर लगे हुए है और साथ में आर्थिक रूप से सुदृढ़ भी हो रहे है। वृद्धजनों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करवाने वाले शेखावटी मॉडल की समीक्षा कर भारत सरकार देश के अनेक वृद्धजनों को निर्बल, अशक्त और निराश होने की स्थिति से बचा सकती है।

भारत सरकार देश के समस्त प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों व आयुष्मान योजना के अंतर्गत संचालित होने वाले समस्त स्वास्थ्य कल्याण केन्द्रों पर सप्ताह के एक निश्चित दिन वृद्धजनों के लिए विशेष ओपीडी क्लिनिक का संचालन करके बुजुर्गों को उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाएं और देखभाल प्रदान करवा सकती है। इससे उन्हें अपने रोग के इलाज के लिए शहरों तक की लम्बी यात्रा नहीं करनी पड़ेेगी और उनके समय, धन और संसाधन की भी बचत होगी। वर्ष 2022 के अंत तक एनपीएचसीई, एनपीसीडीसीएस, एनएमएचपी, एनयूएचएम, एनटीसीपी कार्यक्रमों व आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत आने वाले समस्त प्रकार के पदों पर भर्ती प्रक्रिया को शत प्रतिशत पूर्ण करके व वरिष्ठजनों से सम्बंधित कानूनों, सामाजिक कल्याण योजनाएं व नीतियों को और अधीक सुदृढ़ करके सरकारें बुजुर्गों के जीवन स्तर में व्यापक सुधार ला सकती है। समस्याएं अनेक है तो उनके समाधान भी उपलब्ध है आवश्यकता है तो केवल एक लक्ष्य निर्धारित करते हुए दृढ इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता के साथ बुजुर्गों की सेवा में देश को समर्पित करना।

वर्तमान व भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए जब इस दशक के शुरुआत से ही देश का हर नागरिक पार्लियामेंट से लेकर पंचायत तक समर्पित होकर बुजुर्गों की स्वस्थ देखभाल, सुरक्षा और सेवा में जुट जायेगा तो निश्चित रूप से ही आने वाले वर्षों में देश का प्रत्येक बुजुर्ग व्यक्ति आदर व सम्मान के साथ एक स्वस्थ, सुखमय और कल्याणकारी जीवन व्यतीत कर सकेगा।

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