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सचिन पायलट: सूनी घाटी का सूरज

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सीकर,19 जून 2021। [ बाल मुकुंद जोशी -वरिष्ठ पत्रकार ]  राजस्थान की राजनीति में इस समय कांग्रेस और भाजपा दोनों ही अत्यधिक असंतोष को झेल रही है। भाजपा का असंतोष जहां किसी भी तरह वसुंधरा राजे को रोकने की वजह से है वहीं कांग्रेस में सचिन पायलट की महत्वाकांक्षाओं के कारण है। अब तक के घटनाक्रम में सचिन पायलट राजनीति के एक नौसिखिया ही साबित हुए है। उनके कदमों से अभी तक तो सत्ताधारी दल का नुकसान की बजाय फायदा ही हुआ है और उनके समर्थकों की संख्या में छीजत जारी है। हाल ही की उनकी दिल्ली यात्रा और आलाकमान से मिलने में नाकामी को दिल्ली और जयपुर का उनका समर्थक मीडिया तंत्र भी ढक पाने में नाकाम रहा है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अजय माकन ने यह बयान दिया है कि पायलट एक एसेट है लेकिन इस बयान से सचिन की जमा पूंजी में कोई इजाफा होता नजर नहीं आ रहा है। सबको मालूम है कि माकन के पिछले बयान भी अब तक आश्वासनों का रंग रोगन ही साबित हुए हैं।

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अब जबकि सचिन पायलट के कारण उपजा विवाद कांग्रेस में दूसरी और तीसरी कतार के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सिमटता नजर आ रहा है। सबको बेसब्री से प्रतीक्षा है कि उनका अगला कदम क्या होगा ? दरअसल आज के हालात में सचिन पायलट के पास सीमित विकल्प है। इन विकल्पों को लेकर ही राजनीतिक पर्यवेक्षक अलग-अलग कयास लगा रहे हैं।

सचिन के पास पहला विकल्प है कि वह कांग्रेस में बने रहें और अपने समर्थकों को मजबूत स्थिति में रखें साथ ही अंदरूनी असंतोष को हवा देते रहें। इससे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत दवाब में रहेंगे और विकास का कोई नया काम नहीं कर सकेंगे। साथ ही प्रशासन पर उनका नियंत्रण भी ढिला होता जाएगा। इससे अंततः कांग्रेस को चुनाव में नुकसान हो सकता है और तब सचिन फिर से मजबूत स्थिति में हो सकते हैं। उनके समर्थक कहते भी हैं कि उन्होंने 21 सीटों पर सिमटी पार्टी को सत्ता में पहुंचाया था हालांकि यह कहते समय वे बड़ी होशियारी से इस तथ्य को छुपा जाते हैं कि सचिन के नेतृत्व में ही कांग्रेस लोकसभा की सभी 25 सीटें हारी भी थी। सचिन कांग्रेस में रहकर नेतृत्व को चुनौती देंगे इसके लिए उन्हें लंबा समय लगेगा और कोई जरूरी नहीं है कि आलाकमान इसे पसंद करें। इसके साथ ही अगर गहलोत समर्थकों ने भी मोर्चा खोल दिया तो वह इस जंग में मात भी खा सकते हैं।

सचिन के पास दूसरा विकल्प भाजपा में जाने का है। भाजपा ने उनकी बगावत को सहारा दिया था और माना जाता है कि उस समय भाजपा में विकसित हुए उनके समर्थन के सूत्र अभी बरकरार हैं। भाजपा सचिन पायलट को उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के समय वहां के गुर्जर मतदाताओं को पक्ष में करने का काम ले सकती है। इसके साथ ही कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक झटका देने के लिए भी सचिन को भाजपा में शामिल किया जा सकता है। उनके पुराने साथी ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद के भाजपा में जाने के बाद ऐसी चर्चा है भी,लेकिन इस विकल्प में भी सचिन के हाथ कुछ लगने वाला नहीं है क्योंकि संघ उन्हें शायद ही स्वीकार करें और राजस्थान भाजपा में पहले से लगी हुई मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की कतार में पायलट को काफी पीछे ही खड़ा रहना होगा।

तीसरा विकल्प है कि पायलट अपनी अलग पार्टी बनाये, जिसकी संभावना बहुत कम है। इस काम में लगने वाली शक्ति, पूंजी और धैर्य उनके पास होगा ऐसा लगता नहीं है। इससे राष्ट्रीय नेता की उनकी छवि प्रांतीय गुर्जर नेता में बदल जाने की आशंका है। राजस्थान में तीसरे मोर्चे का ट्रैक रिकॉर्ड कभी अच्छा नहीं रहा हालांकि हनुमान बेनीवाल के सहयोग से पूर्वी और पश्चिमी राजस्थान प्रतिनिधित्व देने वाले ऐसे मोर्चे पर मंथन चल रहा है। ऐसी खबर है लेकिन यह रास्ता भी उनका आसान नहीं लगता। पिछले दिनों एक चर्चा यह भी चली थी कि सचिन पायलट आम आदमी पार्टी का दामन थाम सकते हैं।ऐसा इसलिए मुश्किल है क्योंकि गुर्जर समुदाय की बहुलता वाले इलाकों से घिरी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने यहां एक नए गुर्जर नेता की मौजूदगी शायद ही बर्दाश्त कर सके। सचिन पायलट की अधीरता और उनके सलाहकारों की अपरिपक्वता के कारण आज भी वे ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जिसका कोई भी रास्ता उनकी मनचाही मंजिल (भावी मुख्यमंत्री) की कुर्सी तक नहीं पहुंचता। कांग्रेस में नंबर दो का पद छोड़कर उन्होंने राजनीतिक बिसात पर काफी कुछ खो दिया है। उनके समर्थकों की संख्या भी निरंतर घट रही है और वे एक सुनी घाटी के सूरज की तरह है रह गए हैं, जिनकी चमक देखने वाला कोई नहीं है।

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