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सौदेबाजी के बीच उलझती सियासत के चलते राष्ट्रपति शासन!

 सौदेबाजी के बीच उलझती सियासत के चलते राष्ट्रपति शासन !

 डाॅ. भरत मिश्र प्राची

 देश में चुनाव उपरान्त किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलनम से सौदेबाजी के बीच सियासत सदैव उलझती रही है। इस तरह की स्थिति लाकतंत्र के इतिहास में अस्थिरता ही पैदा करती रही है। वर्तमान समय में हरियाणा एवं महाराष्ट्र दो राज्यों के विधान सभा चुनाव उपरान्त जो स्थिति उभर कर सामने आ रही है जहां हरियाणा में भाजपा ने सरकार तो बना ली पर सपष्ट बहुमत के आभाव में 10 सीट जीत कर आने दल के नेता को उपमुख्यमंत्री का पद सौंपना पड़ा।

इस तरह के हालात में सरकार चलाने के लिये सौदेबाजी सदा होती ही रहेगी। महाराष्ट्र में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा बहुमत के आभाव में अपने सहयोगी दल शिव सेना के साथ मुख्यमंत्री कार्यकाल के बटवारे को लेकर सियासती समझौता नहीं हो पाने के कारण सरकार नहीं बना सकी। वहां एक साथ चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दल भाजपा व शिवसेना एक दूसरे से अलग ही नहीं हुये बल्कि सत्ता के लिये शिव सेना ने अपनो वर्षो संबंध भी तोड़ अपने को एनडीए से अलग कर लिया फिर भी राज्यपाल द्वारा दिये समय के अंतराल तक सरकार बनाने के लिये एनसीपी एवं कांग्रेस का समर्थन पत्र नहीं जुटा पाई।

इसी बीच राज्यपाल ने एनसीपी को सरकार बनाने के लिये आमंत्रण पत्र दे डाला। कांग्रेस इस सियासती गेम को अंत समय तक खेलती रही। इस तरह के हालात किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाने के कारण ही उभरे जहां सियासी जंग में कौन किधर हो जाये कह पाना मुश्किल है। इस तरह के हालात में खरीद – फरोख्त की भी प्रक्रिया तेजी से उभरती है।

इससे बचने के लिये कांग्रेस ने अपने विधायकों को जयपुर भेज दिया एवं शिवसेना व एनसीपी अपने विधायकों पर अुत समय तक नजर गड़ाये रही कि उनका कोई विधायक इस तरह की प्रक्रिया का शिकार न हो जाय। शिव सेना का साथ नहीं मिलने पर भाजपा ने अपनी समझदारी दिखाते हुये राज्यपाल से सरकार बनाने के न्योता को नकार दिया। इसके बाद महाराष्ट्र में गरमाती सियासती हलचलों के बीच राष्ट्रपति शासन की भी बात तेजी से उभरती नजर आई। और अंत में महाराष्ट्र राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लग गया जिसके खिलाफ फिलहाल शिव सेना सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या होगा, कब आयेगा यह तो आग्र की बात है फिलहाल महाराष्ट्र राज्य में शिव सेना का सरकार बनाने का सपना खटाई में पड़ गया है जब कि शिव सेना को सरकार बनाने की भूमिका में मदद देने की कवायद करने वाले राजनीतिक दल एनसीपी एवं कांग्रेस अब भी शिव सेना के साथ सरकार बनाये जाने की वकालत करते नजर आ रहे है।

महाराष्ट्र राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने एवं सरकार नहीं बनने की पृष्ठिभूमि में शिव सेना , एनसीपी एवं कांग्रेस सभी के सभी जिम्मेवार है। राज्य की जनता ने तो सरकार बनाने के लिये भाजपा एवं शिव सेना गठबंधन को जनादेश दिया पर 50 -50 सियासती बटवारे को लेकर दोनों सहयोगी दलों में आपस में ताल मेंल नहीं बैठ पाया। सत्ता बनाने की ललक ने शिव सेना को आज अलग- थलग कर दिया।

सहयोगी दल का साथ नहीं मिलने से भाजपा ने सरकार बनाने के मामले को नकार दिया और शिव सेना को सरकार बनाने के मामले में एनसीपी एवं कांग्रेस ने समर्थन पत्र देने के मामलें में देर कर दिया। इस तरह के बदले हालात जहां हर तरह से सत्ता के लिये सौदेबाजी हावी रही, महाराष्ट्र राज्य को राष्ट्रपति शासन के बीच लाकर आज खड़ा कर दिया। कल महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद फिर से चुनाव हांगे या शिव सेना, एनसीपी एवं कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिलेगा ? कुछ कहा नहीं जा सकता। पर ज्यादा संभावना महाराष्ट्र में दुबारा चुनाव कराने की बनती नजर आ रही है जिसके लिये सियासत में सौदेबाजी की उभरती राजनीति साफ – साफ नजर आ रही है। यदि महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के बाद दुबारा चुनाव की स्थिति बनती हैं तो चुनाव में इस परिवेश का राजनीतिक लाभ भाजपा को मिलता दिखाई दे रहा है। इस तरह के हालात महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन के बाद दुबारा चुनाव होने के संकेत दे रहे है।

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