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नया दौर -जब नया इतिहास बनने जा रहा है तो सबको सोचना पड़ेगा कि वे कहां खड़े होंगे

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झुंझुनूं ,26 जुलाई 2021|( लेखक – राजेन्द्र कस्वा )मैं पहले भी लिखता रहा हूं।हमारे ज्ञात इतिहास में यह प्रमाणित है कि तीन-चार सौ वर्षों में कोई महापुरुष भारतीय समाज को जगाता रहा है । उसके जाने के बाद यह समाज पुनः अपनी सुषुप्त अवस्था में पहुंच जाता ।महाबीर, बुद्ध, चाणक्य, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, रैदास, मीरा और सूफी संत इसके उदाहरण हैं।

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इस क्रम में बीसवीं सदी में चमत्कार हुआ।इस काल को हमारे ज्ञात इतिहास का स्वर्ण काल भी कह सकते हैं।गांधी, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, आम्बेडकर जैसे नेता एक साथ हुए ।हम आजाद तो हो गये किन्तु इसी दौर में एक बड़ी जमात घात लगाये बैठी थी कि कब उसे अवसर मिले और आगे बढते इस देश को सिर के बल खड़ा किया जाये । 2014 में इस जमात को सफलता मिल गई ।2019 में झूठ व नौटंकी के सहारे पुनः अधिक मजबूती से काबिज हो गई । इसके बाद तो इनका अहंकार और मनमानी आसमान छूने लगे।पिछले सात साल मनमाने व मूर्खतापूर्ण फैसलों के लिए जाने जायेंगे।आमजन को मानो बियाबान जंगल के अंधेरे में भटकने के लिए छोड़ दिया गया है।

इस खतरनाक स्थिति के लिए विपक्ष का हताश होना व मीडिया का मृतप्राय होना बड़ा कारण है।किन्तु बुद्धिजीवी वर्ग का उदासीन होना तथा साहित्य का सन्नाटा भी कम जिम्मेदार नहीं।कबीर मीरा ने सामंती दौर में विद्रोह किया था।आज लोकतंत्र में साहित्य में श्मशान घाट का सा सन्नाटा पसरा हुआ है।इसे सत्तारूढ जमात ने अच्छी तरह भांप लिया।तब वह आवारा सांड की तरह जहां-तहां सींग मारने लगे।इनके चेहरे पर नफरत और गुरूर साफ देखा जा सकता है ।अंततः सत्ता के इस बिगड़ेल सांड को काबू में करने का बीड़ा उठाया ।क्योंकि इनकी जीविका पर संकट आ गया ।ये चुप रहते तो सांड इनकी खेती चर जाता। यह जन आन्दोलन किसी सर्वमान्य नेता के नेतृत्व में नहीं पैदा हुआ बल्कि पीड़ित किसान स्वतः ही सड़कों पर आ गया । इसीलिए यह वास्तविक जन आन्दोलन है और दुनिया में संभवतः पहला आंदोलन है ।लोकतंत्र व संविधान को भी बचाने वाला आंदोलन है।मजदूर व युवा इससे जुड़े हुए हैं। जब नया इतिहास बनने जा रहा है तो सबको सोचना पड़ेगा कि वे कहां खड़े होंगे ।

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