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मंडावा विधानसभा की सीट एक बार फिर कांग्रेस के पाले में, मतदान के साथ ही स्थिति हुई साफ

सूरजगढ़ उप चुनाव के बाद एक बार फिर राजेंद्र राठौड़ के नेतृत्व में भाजपा को मिलेगी शिकस्त

दो केंद्रीय मंत्री, नेता प्रतिपक्ष व भाजपा प्रदेशाध्यक्ष की पूरी ताकत भी नही भेंद पाई मंडावा के कांग्रेसी गढ़ को

झुंझुनूं। मंडावा विधानसभा उप चुनाव में भाजपा की सीट छीनकर कांग्रेस के पास जाना सोमवार मतदान संपन्न होने के साथ ही तय हो गया है। राजनैतिक सूत्रों का मानना है कि भाजपा प्रत्याशी सुशीला सीगड़ा कांग्रेस प्रत्याशी रीटा चौधरी से करीब दस हजार से अधिक मतों से हार सकती है। जिसमें भाजपा का देरी से टिकट देना, अंतिम वक्त में सांसद पुत्र को टिकट देकर वापस ले लेना, अंतिम समय पर टिकट की मांग करने वाले भाजपाईयों को टिकट नही देकर गैर भाजपाई को टिकट देने से भाजपा के भीतरघात हुआ माना जा रहा है। इसके अलावा भाजपा प्रत्याशी सुशीला सीगड़ा अंतिम समय तक केवल प्रदेश के बड़े नेताओं के भरोसे ही चुनाव प्रचार में जुटी रही, वह विधानसभा के आम मतदाता से अपना सीधा जुड़ाव करने में सफल नही हो पाई। भाजपाईयों का ही मानना है मंडावा विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रभारी बनाये गए प्रतिपक्ष उप नेता राजेंद्र राठौड़ के कारण भाजपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ेगा। वर्ष 2015 में सूरजगढ़ उप चुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता डॉ. दिगम्बर सिंह की चुनावी कमान भी राजेंद्र राठौड़ के हाथों में थी। वहां पर भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। भाजपाईयों का कहना है कि राजेंद्र राठौड़ अपना राजनैतिक कद बढ़ाने के लिए चूरू के नजदीकी जिलों में अपना प्रभाव दर्शाना चाहते है, जिसका असर जाट बाहुल्य इलाकों में उल्टा होता है। वर्ष 2015 व 2019 के उपचुनावों में भी राजेंद्र राठौड़ के हाथों में चुनावी कमान होने से भाजपा को दोनों बार हार का सामना करना पड़ा है।
भाजपा प्रत्याशी सुशीला सीगड़ा के चुनाव प्रचार में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां सहित केंद्र के दो मंत्री, प्रतिपक्ष नेता गुलाबचंद कटारिया सहित भाजपा के अनेक दिग्गज नेता कई दिनों तक मंडावा उप चुनाव में समय दिया, लेकिन जीत दिलाने में असफल रहे। भाजपा ने मंडावा से जीत हासिल करने के लिए ही गैर भाजपाई को चुनाव मैदान में उतारा था और वो भी भाजपा की टिकट की मांग करने वालों में दूसरे स्थान पर सबसे मजबूत प्रत्याशी मानी गई थी। इस प्रकार जनता के वोट व मानस के सामने भाजपा के सारे सर्वे फैल हो गए।
दूसरी ओर कांग्रेस प्रत्याशी पूर्व विधायक रीटा चौधरी दो बार चुनाव हारने व कांग्रेस का इस बार सत्ता में होने के कारण चुनाव जीतना तय हो गया था। दो बार चुनाव हारने के कारण यहां के मतदाता की सहानुभूति रीटा चौधरी के प्रति हो गई। साथ ही सत्ता में होने के कारण कर्मचारी वर्ग स्थानान्तरणों के लिए रीटा चौधरी के पक्ष में मतदान करने का मानस बना चुका था। साथ ही रीटा को चुनाव प्रचार के लिए भरपूर समय मिला, क्योकि मंडावा विधायक नरेंद्र खीचड़ के सांसद बनने के बाद से ही रीटा चौधरी आमजन से संपर्क करना प्रारंभ कर दिया था। कांग्रेस से दमदार प्रत्याशी के रूप में एकमात्र दावेदार होने कारण मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंडावा विधानसभा में विकास कार्यो व सरकारी कर्मचारियों के स्थानान्तरणों में भी बहुत अधिक महत्व दिया। जिसके कारण कांग्रेस प्रत्याशी जीत के नजदीक पहुंच पाई।

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