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क्या भाजपा ने जाटों की चिंता छोड़ दी है ?

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सीकर 11 जुलाई 2021(बाल मुकुंद जोशी ) ■ मोदी के कैबिनेट विस्तार में एक भी जाट सांसद को जगह न मिलने की अभी चर्चा ही हो रही थी कि बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने किसान वर्ग के सम्माननीय नेता स्व.श्री शीशराम ओला पर अभद्र और अमर्यादित टिप्पणी कर इस वर्ग की उपेक्षा के ताजा घाव पर नमक छिड़क दिया। भाटिया को शायद इस बात का एहसास भी नहीं था कि राजस्थान का जाट समाज स्व.ओला के अपमान से इतना आहत हो जाएगा कि संभालना मुश्किल होगा। सिर्फ जाट समाज ही नहीं ओला के प्रति ओछी टिप्पणी से राजस्थान के सभी वर्गों के तमाम लोग अपमानित महसूस कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा, सचिन पायलट के साथ-साथ वरिष्ठ वरिष्ठ नेता महादेव सिंह खंडेला, अश्क अली टाक, सुभाष महरिया व हनुमान बेनीवाल ने भाटिया के बयान की भर्त्सना की है। इसके बावजूद भाजपा के किसी भी नेता ने भाटिया के बयान की आलोचना नहीं की। न खुद गौरव भाटिया को इस पर कोई अफसोस है और ना ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया की कोई प्रतिक्रिया आई है। इससे ऐसा लगता है कि भाजपा ने अपने राजनीतिक समीकरणों में अब जाट समुदाय को विशेष महत्व न देने का फैसला कर लिया है। इसका एक मोटा कारण किसान आंदोलन भी है। राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के सचिव रामसिंह कस्वां ने एक दिन पहले के बयान में इस सवाल का का जवाब छिपा है कि आखिर बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व जाटों  से नाराज क्यों है। कस्वां के मुताबिक मोदी सरकार के गले की हड्डी बने किसान आंदोलन का नेतृत्व उत्तर प्रदेश, हरियाणा,राजस्थान और पंजाब के जाट नेताओं के हाथ में है। इसलिए मोदी व्यक्तिगत रूप से जाटों से नाराज लगते हैं। ऐसा लगता है कि भाजपा अपने सोशल इंजीनियरिंग में अब जाटों का विकल्प ढूंढने में जुट गई है। अब तक जाटों को केंद्र में रखकर राजस्थान की राजनीति में रास्ता बनाने वाली भाजपा अब शायद इस वर्ग पर भरोसा नहीं करती।

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स्व.शीशराम ओला 9 बार विधायक, पांच बार सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे हैं। झुंझुनू जिले में वे बालिका शिक्षा की मशाल जलाने वाले माने जाते हैं। उनकी प्रसिद्धि एक समाजसेवी और गरीब हितैषी की रही है। उन्होंने राजनीति में भी सभी ऊंचाइयों को छुआ,जिन तक पहुंचना आज के नेताओं के लिए दिवास्वप्न है। पद्मश्री से सम्मानित ओला का पूरा जीवन ही राजस्थान के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। गौरव भाटिया के बयान ने ओला की दिवंगत आत्मा को कष्ट पहुंचाने के साथ-साथ उन लोगों के भ्रम को भी तोड़ दिया है जो भाजपा को जाटों का हितैषी मानकर उसे जुड़े जुड़ने लगे थे। राजस्थान की राजनीति पर गौरव भाटिया के इस आपत्तिजनक बयान और कैबिनेट में एक भी जाट को शामिल नहीं करने के दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे। भाजपा नेतृत्व इस बात से अनजान नहीं है कि सीकर,झुंझुनूं,चूरू,नागौर,श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर,जैसलमेर, बाड़मेर,जोधपुर,सिरोही,पाली और अजमेर में जाट समुदाय निर्णायक मतदाता है। इसके बावजूद जाटों की उपेक्षा से यह तय है कि भाजपा आने वाले समय में गैर जाट राजनीति के सारे अपना भविष्य तय करने के बारे में गंभीरता से सोच रही है। अब सवाल जाट समुदाय के सामने है कि वे भाजपा के साथ अपने रिश्ते को कैसे तय करेगा। भाजपा के प्रदेश नेतृत्व के सामने भी ओला के अपमान के बाद न तो निकलते बन रहा है न उगलते और अगर जाट समुदाय जो स्वभाव से भावुक लेकिन राजनीतिक रूप से सजग है, ने भाजपा से दूरी बना ली तो उसके कई जाट नेताओं के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो सकता है। इस प्रकरण से हनुमान बेनीवाल  भाजपा से रिश्ते को स्पष्ट करने को मजबूर हो जाएंगे। यह सवाल भावनाओं से जुड़ा है।राजस्थान में परसराम मदेरणा, नाथूराम मिर्धा और शीशराम ओला के नाम पिछली आधी शताब्दी से जाट समुदाय ही नहीं अन्य लोगों के दिलों से जुड़े रहे हैं। इन ताजा घटनाओं से भाजपा को करीब करीब आधे राजस्थान में राजनीतिक नुकसान भी हो सकता है।

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