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भाजपा में मजबूत लीडरशीप के अभाव में राजस्थान राज्यसभा चुनाव में पार्टी नही कर पाएंगी सेंधमारी मध्यप्रदेश-गुजरात की तर्ज पर बड़ा उलटफेर करने की आस में भाजपा ने उतारा है चौथा प्रत्याशी

विधायकों की संख्या के हिसाब से कांग्रेस को दो व भाजपा को एक राज्यसभा सीट मिलना तय

जयपुर (स्वतंत्र पत्रकार राजन चौधरी)। आगामी 19 जून को होने वाले तीन राज्यसभा सदस्यों के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में मजबूत लीडरशीप के अभाव में मध्यप्रदेश व गुजरात की तर्ज पर राजस्थान में कोई उलटफेर करने में कहीं सफल होने के आसार नजर नही आ रहे है। राजनैतिक सूत्रों के अनुसार राजस्थान में विधायकों की संख्या के हिसाब से कांग्रेस को दो व भाजपा को एक राज्यसभा क सीट मिलना तय है, परंतु भाजपा ने चौथा प्रत्याशी मैदान में उतारकर कांग्रेसियों की आपसी नाराजगी व कटुता का लाभ लेना चाह रही है।

इस प्रकार भाजपा राजस्थान में भी गुजरात व मध्यप्रदेश की तरह राजनैतिक सेंध मारने का प्रयास कर रही है, लेकिन भाजपा के पास प्रदेश स्तरीय इस प्रकार का लीडर नही है, जो कांगे्रस या उसके सहयोगियों को विशेष प्रकार का लालच, राजनैतिक सपने दिखाकर अपने पाले में ला सकें। वर्तमान प्रदेश बीजेपी में कद्दावर लीडर के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को ही राज्य की जनता व राजनीति करने वाले नेता मानते है। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री राजे राज्यसभा सीटों के लिए विधायकों में तोडफ़ोड़ करने या भाजपा के दूसरे प्रत्याशी के लिए अन्य किसी प्रकार की राजनीतिक कर उन्हें राज्य सभा में भेजने के लिए सक्रिय नही है। ऐसी स्थिति में माना जा सकता है कि भाजपा के पक्ष में 75 विधायकों के अलावा वोट आने की संभावना नही के बराबरा है।

हांलाकि राज्य में भाजपा को मजबूत बनाने व राज्य सभा के दूसरे सदस्यों को जिताने के लिए दिल्ली भाजपा के राष्ट्रीय लीडर या दिल्ली में विभिन्न पदों पर पदस्थापित भाजपाई ही प्रयास कर रहे है। लेकिन इन नेताओं पर राज्य के कांगे्रसी या कांग्रेस समर्थित विधायक ज्यादा भरोसा या भविष्य इनसे जुडऩे में उन्हें कोई राजनैतिक लाभ नही देख रहा है। ऐसी स्थिति में राजस्थान में भाजपा गुजरात व मध्यप्रदेश की तर्ज पर राजनीतिक तोडफ़ोड़ या कोई बड़ा फेरबदल करने की स्थिति में नही है।

राजस्थान कांगे्रस के प्रदेशाध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच आपसी राजनैतिक खींचतान जगजाहिर है। लेकिन दोनों ही नेताओं द्वारा खुले रूप से एक दूसरे की टांग खींचाई संभवतया जनता को दिखाने के लिए ही करते है। ये दोनों ही नेता कांग्रेस पार्टी के लिए एक मंच पर एक साथ मिलते है। जिसमें चाहे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा राज्यसभा के प्रत्याशियों का चयन हो या अन्य कोई राजनैतिक नियुक्ति करनी हो, उनमें पायलट की कहीं नही चलती। पायलट कांग्रेस के हाईकमान से स्वयं के लिए कुछ-कुछ करवा सकते है, परंतु उनके समर्थकों के लिए बहुत अधिक कराने का प्रयास भी नही करते और गहलोत अपने राजनीतिक अनुभव के कारण पायलट को करने भी नही देते। इसी कारण राज्य में कांग्रेस में किसी प्रकार की टुट फुट होने की संभावना नही है।

इसका मुख्य कारण माना जा रहा है कि अशोक गहलोत प्रत्येक कांगे्रेसी विधायक व समर्थन करने वाले विधायकों से व्यक्तिगत संपर्क में है। यहीं नहीं राजनैतिक सूत्रों का कहना है कि कांगे्रस के प्रत्येक विधायक के पीछे गहलोत समर्थक कांग्रेसी व अधिकारी भी लगे हुए है। कौन विधायक कहां जा रहा है, किस-किस से मिल रहा है। सूत्रों का मानना है कि कांग्रेस के कुछ संदिग्ध विधायकों के फोन भी टेप हो रहे है। एक वरिष्ठ कांगेे्रसी नेता का कहना है कि अशोक गहलोत के कारण राज्य के कांगे्रस व कांग्रेसी समर्थित विधायकों का भाजपा के पक्ष में मतदान करने की संभावना बहुत ही नाम मात्र है।

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