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जीवन के हरेक क्षेत्र को प्रभावित करता अवसाद

अवसाद एक प्रमुख जन-स्वास्थ्य समस्या बन करके तेजी से उभर रहा है जो कि भारत सहित विश्व के सभी उम्र, लिंग, जाति, धर्म, सामाजिक और आर्थिक समूह के लोगों के जन-जीवन को प्रभावित कर रहा है । विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘डिप्रेशन एंड अदर कॉमन मेंटल डिसऑर्डर्स – ग्लोबल हेल्थ एस्टिमेट्स, 2017’ की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 में विश्व स्तर पर अनुमानित 32.2 करोड़ लोग अवसाद से प्रभावित थे जिनमे से लगभग 14 प्रतिशत लोग यानि कि 4.5 करोड़ लोग भारत में अवसाद से प्रभावित थे । राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण, 2015-16 के अनुसार भारत में 18 वर्ष से अधिक आयु के 20 में से 1 लोगों को कभी न कभी अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार अवसादग्रस्तता की समस्या का सामना करना पड़ा है । सभी स्वास्थय रिपोर्ट्स, सर्वेक्षण और आंकड़े मिलकर ध्यान दिला रहे है कि अवसाद एक विशाल जनस्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक समस्या बन चूका है जो कि जीवन के हरेक क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है लेकिन अक्सर हम ऐसी रिपोर्ट्स और सर्वेक्षण को नज़रंदाज़ कर देते है । वर्तमान दौर में बचपन से लेकर बुढ़ापे तक की हर अवस्था और आयु का व्यक्ति अवसाद से प्रभावित हो रहा है जिसका हमारी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक, पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन एवं व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2017 में जारी की गयी ‘डिप्रेशन इन इंडिया – लेट्स टॉक’ नामक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अवसाद से ग्रस्त लगभग दो तिहाई लोगों ने बताया कि अवसाद उनके कार्य जीवन को प्रभावित करता है । रिपोर्ट के अनुसार भारत में अवसादग्रस्तता विकार वाले 50 प्रतिशत से अधिक व्यक्तियों ने बताया कि उनके हालत उन्हें उनके दैनिक गतिविधियों को पूरा करने में बाधा उत्पन्न करते है और महीने में ऐसा लगभग 20 दिन होता है । इसी से हम अंदाज़ा लगा सकते है कि व्यक्ति पर अवसाद का प्रभाव इतना गहरा होता कि सामान्य कार्य करने में भी वह असमर्थ हो जाता है । न केवल अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति बल्कि उसकी देखरेख करने वाले परिवार के सदस्यों के भी दैनिक और सामाजिक जीवन पर गहरा असर पड़ता है । अवसादग्रस्त व्यक्ति की देखरेख, उपचार, चिकित्सीय परामर्श और परिवहन पर भी एक परिवार का महीने में लगभग 1500 रुपैया या उससे अधीक का खर्चा होता है । सभी स्थितियां मिलकर व्यक्ति के 24 तत्वों को इतना अधिक घेर लेती है कि व्यक्ति  अपने ही बनाये आतंरिक और बाहरी वातावरण में उलझता चला जाता है । इसी उलझन में पड़ा व्यक्ति सृजन कम और संहार अधीक कर रहा है । सिवाय रुग्णता, निर्बलता और निराशा के कुछ भी नहीं कमा रहा है । ऐसे में हिंदी के महान कवि ‘हरिवंशराय बच्चन’ जी की लिखी कविता ‘नीड़ का निर्माण’ की यह पंक्तियाँ व्यक्ति के लिए प्रेरणास्रोत का काम करती है ।

वे लिखते है कि – ‘नाश के दुख से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख, प्रलय की निस्तब्धता से सृष्टि का नव गान फिर-फिर! नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्वान फिर-फिर! और इसमें कोई दो राय नहीं है कि सकारात्मक सृजन अनेक समस्याओं का समाधान कर देता है । वर्तमान समय में अच्छी बात यह है कि उचित चिकित्सीय परामर्श और उपचार से अवसादग्रस्त व्यक्ति उपचार के दौरान या पूर्णतः स्वस्थ होकर भी अपना जीवनयापन सामान्य तरीके से कर सकता है । पहले के मुकाबले और अधीक बेहतर कार्य कर सकता है । फिर से अपने जीवन को नई उर्जा, दिशा और गति दे सकता है । कोरोना संकट काल के समय उत्पन्न हुई परिस्थितियों ने व्यक्ति को इतना समय दे दिया है कि वो अपने शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य की भी उचित देखभाल कर सकें । धीरे-धीरे ही सही लेकिन अवसादग्रस्त व्यक्ति अब खुलकर अपनी मन की बात, विचार और भावनाएं व्यक्त कर रहे है । प्रेम, कृतज्ञता और सहानुभूति की नई परिभाषाएं गढ़ रहे है । सृजन कर रहे है । लगातार आयोजित किये जा रहे जागरूकता अभियान से आमजन भी मानसिक विकारों से जुड़े झूठ, भ्रान्तियों, कलंक और भेदभाव को मिटाते हुए खुले मन से अवसादग्रस्त व्यक्ति की बात और भावनाएं समझ रहे है, उन्हें स्वीकार कर रहे है । अवसाद को जानने-समझने के लिए विशेषज्ञों से चर्चाएं व संवाद कर रहे है । जिस प्रकार ‘क’ ‘ख’ अक्षरारम्भ का अभ्यास करते-करते व्यक्ति शास्त्रों का विद्वान बन जाता है ठीक उसी प्रकार मानसिक रोगों के प्रति जागरूक होने के लिए आमजन ने अभ्यास आरंभ कर दिया है जो कि आने वाले समय में आत्मनिर्भर भारत के निर्माण लिए शुभ संकेत है ।

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भूपेश दीक्षित 

जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ, जयपुर – राजस्थान 

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