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कोविड-19 की दूसरी लहर से प्रभावित परिवारों को नागर समाज का सहयोग : पहुंच और संसाधन

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नई दिल्ली,4 जुलाई 2021| कोविड-19 महामारी ने हमारे समाज में मौजूदा असमानताओं को बढ़ाने का काम किया है। इस महामारी से सभी प्रभावित हुए हैं, लेकिन गरीब और हाशिए पर जीवन जीने वाले लोग अधिक प्रभावित हुए हैं । कोविड-19 की पहली लहर के मद्देनजर, अन्य संस्‍थाओं के सहयोग से प्रिया ने मई 2020 में एक अध्ययन किया, ताकि यह समझा जा सके कि नागर समाज संगठनों ने हाशिए पर रहने वाले समुदायों की उभरती जरूरतों को कैसे पूरा किया है। इस अध्ययन के निष्कर्षों को ‘कैपेसिटीज देट कैन मेक ए डिफरेंस’  शीर्षक नामक रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया था। प्रिया और VANI द्वारा ‘रिस्पांस ऑफ इंडियन सिविल सोसाइटी टुवर्ड्स कोविड -19’  नामक एक अध्ययन रिपोर्ट ने भी प्रभावित परिवारों के सहयोग में नागर समाज के प्रयासों को प्रकाशित किया था।

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कोविड-19 की दूसरी लहर ने देश को पहली लहर की तुलना में अधिक प्रभावित किया। दूसरी लहर में वायरस का प्रसार बहुत तीव्र था। इसने देश भर में सैकड़ों परिवारों को अपनी चपेट में लेकर भारी तबाही मचाई। यह उन गरीबों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए बहुत कष्टदायी था,  जो संसाधनों के अभाव में इस महामारी के खिलाफ लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई का सामना कर पाने में सक्षम नहीं थे।

समुदाय पर महामारी के व्यापक प्रभाव को देखते हुए सरकार, निजी क्षेत्र और नागर समाज द्वारा संगठित कार्रवाई की आवश्यकता थी। हालाँकि, जब दूसरी लहर आई तो विदेशी अंशदान नियामक अधिनियम, 2020 (FCRA, 2020) में संशोधन के चलते स्वैच्छिक संस्थाओं के संसाधन और संचालन के तरीके में बहुत कुछ बदलाव हो चुका था। इस संशोधन के तहत किसी संस्‍था द्वारा अन्‍य संस्‍था को विदेशी संसाधन फिर से देने पर रोक लगा दी गई थी। छोटे और मध्यम आकार के संगठनों पर इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा, जो अक्सर बड़े संगठनों से संसाधनों का उपयोग करते थे जो दान दाता संस्‍थाओं के सीधे संपर्क में थे।

नागर समाज ने प्रभावित परिवार जिन जरूरतों और चुनौतियों का सामना कर रहे थे, उनका  सहयोग किया। हालाँकि, प्रभावित समुदायों को नागर समाज द्वारा प्रदान की गई सहायता की सीमा का पता लगाने के लिए कोई डेटा उपलब्ध नहीं था। 26 मई 2021 को  प्रिया, सेंटर फॉर यूथ एन्‍ड सोशल डेवलपमेंट, समर्थन, सहभागी शिक्षण केन्‍द्र और उन्‍नति संस्‍था की पहल पर देश के विभिन्न हिस्सों से 56  संस्‍थाओं ने ऑनलाइन प्‍लेटफार्म पर मिटिंग के माध्‍यम से उभरती स्थिति पर अपने विचार साझा किये। इसमें अन्य बातों के अलावा,  वर्तमान परिस्थिति में विभिन्‍न संस्‍थाओं द्वारा किये गये सहयोग को समझने के लिये एक सर्वेक्षण करने पर विचार किया गया। ताकि  आवश्‍यकताओं का विश्‍लेषण कर त्‍वरित किये जाने वाले कार्यों की योजना बनायी जा सके।

प्रिया में एक सर्वेक्षण दल के गठन के साथ सर्वेक्षण का काम शुरू किया गया। संस्‍थाओं से 1-12 जून 2021 तक ऑनलाइन प्रतिक्रियाएं प्राप्‍त की गईं। 26 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों से कुल 583 संस्‍थाओं ने इस सर्वेक्षण में भाग लिया। लेकिन कुछ संस्‍थाओं की प्रतिक्रियाएं अधूरी होने के कारण, अंतिम विश्लेषण के लिए कुल 577 प्रतिक्रियाओं शामिल किया गया।

सर्वेक्षण में भाग लेने वाले नागर समाज संगठन प्रमुख रूप से छोटे और मध्यम आकार के संगठन थे। सर्वेक्षण से पता चला कि पूरे देश में उनकी उपस्थिति है। जिनमें से दो-तिहाई संस्‍थाएं ऐसी हैं जो 1 करोड़ से कम वार्षिक बजट में 1-5 जिलों में काम कर रही हैं। इनमें से लगभग आधी संस्‍थाएं तमाम बाधाओं के बावजूद विभिन्‍न मुद्दों पर 16-20 वर्षों से काम कर रही हैं। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत संस्‍थाएं जमीनी स्‍तर पर समुदायों के साथ कार्यक्रमों का क्रियान्‍वयन कर रही हैं। सर्वे में शामिल संस्‍थाएं विभिन्न मुद्दों पर नेटवर्किंग के साथ-साथ अभियान और पैरवी का कार्य कर रही हैं। जिसमें शोध व अध्ययन करना; समुदाय आधारित संगठनों जैसे महिला समूह, युवा, किसान; अग्रिम पंक्ति के सरकारी कर्मचारी; स्थानीय सरकारी अधिकारी, जमीनी स्तर की अन्‍य संस्‍थाओं सहित विभिन्न विकास प्रतिनिधियों की क्षमतावृद्धि करना, आदि शामिल है।

लगभग दो-तिहाई संस्थाओं (66 प्रतिशत) का वार्षिक बजट 1 करोड़ रुपये से कम है, जो दर्शाता है कि ये छोटे जमीनी स्तर के संगठन हैं। केवल 5 प्रतिशत संस्‍थाएं ऐसी हैं जिनका वार्षिक बजट 1 करोड़ से अधिक है। कुछ ही संस्‍थाएं ऐसी हैं जिनका वार्षिक बजट पांच करोड़ से अधिक है। इस श्रेणी में बड़ी संस्‍थाएं शामिल हैं,  जिनमें से कुछ का वार्षिक बजट 15 करोड़ से अधिक है ।

सर्वेक्षण में शामिल संस्‍थाओं से लगभग 50  लाख संकटग्रस्‍त परिवारों को सहयोग प्राप्‍त हुआ है। संस्‍थाओं ने मुख्य रूप से जरूरतमंद परिवारों को भोजन,  व्यक्तिगत स्वच्छता सामग्री और चिकित्सा आपूर्ति प्रदान की है। उनमें से कई ने महामारी के संकट से प्रभावित परिवारों को भावनात्मक सहयोग भी दिया है। इसके अलावा कुछ संस्‍थाओं ने वंचित परिवारों को नकद सहायता भी प्रदान की है। आकार में छोटे होने के बावजूद, अधिकांश संस्‍थाओं ने सामूहिक रूप से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में महत्वपूर्ण पहुंच बनाई है। महामारी की दूसरी लहर के दौरान प्रामाणिक जानकारी तक पहुंच समुदाय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता थी। अधिकांश संस्‍थाओं ने सूचना-मध्यस्थों के रूप में सरकार और अन्य विशेषज्ञ संस्थानों से प्रामाणिक जानकारी प्राप्त कर, उन्हें स्थानीय भाषाओं में सरल बनाकर समुदाय के बीच प्रसारित करने का कार्य किया ।

78 प्रतिशत संस्‍थाओं ने भोजन वितरित किया; लगभग 91 प्रतिशत संस्‍थाओं ने समुदाय के साथ-साथ फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत स्वच्छता सामग्री जैसे मास्क, सैनिटाइटर, सैनिटरी पैड, दस्ताने और पीपीई किट प्रदान किए। 73 प्रतिशत संस्‍थाओं ने दवाओं, ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन कन्‍सनट्रेटर और ऑक्सीमीटर सहित विभिन्न प्रकार की चिकित्सा आपूर्ति प्रदान की है। इनमें से कुछ ने मरीजों के लिए प्लाज्मा और रक्तदाताओं की व्यवस्था भी की। लगभग 40 प्रतिशत संस्‍थाओं ने रोगियों के अस्पताल में भर्ती होने में मदद की और कोविड-19 परीक्षणों की व्यवस्था की। इसके अलावा, लगभग 20 प्रतिशत संस्‍थाओं ने संगरोध केंद्रों को तैयार करने में मदद की ।

200 से अधिक संस्‍थाओं ने बताया कि उनके कर्मचारी वायरस संक्रमण के कारण बीमार हुए हैं और 50 से अधिक ने अपने कर्मचारियों की मृत्यु होने की जानकारी दी है। इन कठिन परिस्थितियों में भी संस्‍थाओं ने सामुदायिक सेवा का कार्य जारी रखा। 92 प्रतिशत संस्‍थाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय संसाधनों की अनुपलब्धता थी। वित्तीय संकट के कारण इनके संचालन में गतिरोध उत्‍पन्‍न हुआ।

नागर समाज क्षेत्र आम तौर पर कई वर्षों से कम संसाधन वाला रहा है, संसाधनों की कमी ने छोटे और मध्यम आकार की संस्‍थाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। इनमें से बहुत कम संस्‍थाएं प्रभावित समुदायों को राहत और अन्य सहायता प्रदान करने के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटा सकीं । फिर भी, स्वयं के संसाधनों के साथ जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचने की उनकी क्षमता प्रशंसनीय रही है, जैसा कि सर्वे के विश्‍लेषण में निकलकर आया है। सर्वेक्षण से पता चला कि अधिकांश संगठनों (42 प्रतिशत) को राहत और सामुदायिक सहायता गतिविधियों के संचालन के लिये अपने स्वयं के संसाधनों का उपयोग करना पड़ा। 40 प्रतिशत संस्‍थाएं इस कार्य में सहयोग देने के लिए कोई नया संसाधन जुटाने में असमर्थ थी। 7 प्रतिशत संस्‍थाएं  दूसरी लहर के दौरान महामारी आपदा निवारण के लिए भारतीय सीएसआर (CSR) फंडिंग प्राप्त करने में सफल रही। कम से कम 6 प्रतिशत संस्‍थाओं ने बताया कि उन्होंने स्थानीय समुदाय से संसाधन जुटाए, जो छोटा लेकिन उत्साहजनक था। विदेशी दान दाताओं का योगदान, व्यक्तिगत और संगठनात्मक दोनों,  प्रवासी भारतीय और अन्य स्रोतों का योगदान केवल 6 प्रतिशत था।

यह उन सभी के लिये विचार करने योग्‍य है जो संसाधनों के वितरण और नीतियां बनाने का काम करते हैं, जैसे – सरकार, अंतर्राष्‍ट्रीय दान दाता,  लोक परोपकारी और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी कार्यक्रम आदि। यह बहुत सारे संसाधन प्रदाताओं के लिए भविष्य की रणनीतिक विकल्‍प होने जा रहा है,  क्या प्रभावशाली व्यक्तिगत आउटरीच वाली कुछ बड़ी संस्‍थाओं को ढूंढना और उन्हें फंड उपलब्‍ध कराना पर्याप्त है या जमीनी स्‍तर पर समुदाय तक प्रभावशाली पहुंच वाली छोटी संस्‍थाओं के साथ काम करना बेहतर है?

नीति आयोग, जिसने सरकार की ओर से नागर समाज से गहरी कृतज्ञता के साथ सहयोग मांगा था, को वित्तीय और कानूनी नियामक ढांचे पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है जो छोटे और मध्यम आकार के संगठनों द्वारा संसाधनों तक पहुंच को बाधित करते हैं। यह प्रश्न पूछे जाने की आवश्यकता है कि क्या सार्वजनिक कानूनों और नीतियों द्वारा नागर समाज पर लगाए गए प्रतिबंधों की अनदेखी करना और फिर भी उनसे संकट के समय जनता की भलाई की उम्मीद करना उचित है? (द्वारा : प्रिया,नई दिल्ली)

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