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हेरी थके तट सिंधु सबै तब…

को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो

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लेखक – भूपेश दीक्षित
जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ, राजस्थान

कोरोना काल थक कर निराश होकर बैठने का नहीं है । यह समय है विपदा से बचने का उपाय करने का ।  जब लक्ष्य और उद्देश्य स्पष्ट है तब यह समय कार्य की सफलता-असफलता के बारे में मन में किसी भी प्रकार का संदेह रखने का नहीं है । यह समय है कायरता त्यागकर मन में धीरज धर, दृढ निश्चयी होकर, कार्य भूमिका जानकार, शारीरिक, मानसिक व आत्मिक बल और बुद्धि को जागृत कर कार्य करने का । श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धाकांड में तुलसीदास जी लिखते है कि जब अंगद, जामवंत, हनुमान आदि सहित  सभी  वानर सीताजी को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते थक कर और निराश होकर विशाल समुद्र तट पर बैठे थे तब सम्पाती नामक गिद्ध ने वानरों को अभय वचन देकर सहायता हेतु उपाय कहा ‘जो नाघइ सत जोजन सागर करइ सो राम काज मति आगर’ अर्थात जो सौ योजन यानि लगभग बारह सौ किलोमीटर समुद्र लाँघ सकेगा और बुद्धिनिधान होगा, वही श्री रामजी का कार्य कर सकेगा । तब यह जानकार वानरों के मन में अत्यंत विस्मय हुआ । सब किसी को अपने-अपने बल पर विश्वास तो था लेकिन सामने विशाल सागर देखकर समुन्द्र के पार जाने-आने में सभी ने संदेह प्रकट किया । मन और मस्तिष्क में सुग्रीवजी के कहे हुए वचन भी कौंध रहे थे जिसे तुलसीदास जी संकटमोचन हनुमान अष्टक में लिखते है कि ‘जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो’ अर्थात सुग्रीव ने वानरों के समूहों को कहा कि जो भी महीनेभर की अवधि बिताकर बिना सीताजी का पता लगाए यहाँ आएगा उसे मैं प्राणदंड दूंगा ।

                       विपदा के उस काल में जो हाल वानरों का था आज कोरोनाकाल में वही हाल समूचे विश्व का है । ज्ञान और विज्ञान मिलकर कार्य कर रहे है । निरंतर आती चुनौतीयों से पार पा रहे है किन्तु प्राणों पर आये संकट के डर से सभी के मन में भय और संदेह व्याप्त है, विश्वास डगमगा रहा है । कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण प्रियजनों या परिचितों के खोने से, बेरोजगार होने से, उद्योग-धंधे बंद होने से, कालाबाजारी व असंवेदनशीलता बढ़ने आदि से मन अथाह दुखी है । एक के बाद एक आती संक्रमण की लहरों से चारों ओर घोर निराशा है । संसार पर आये इस घोर संकट और निराशा के कारण मन ने भी चुप्पी साध रखी है ।

                   ऐसे समय में हमें ऋक्षराज जाम्बवान जी ने जो रामभक्त हनुमान जी से कहा था उससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता है । इस प्रेरणादायक प्रसंग को तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धाकांड में लिखते है कि ‘कहइ रीछपति सुनु हनुमाना । का चुप साधि रहेहु बलवाना ॥ पवन तनय बल पवन समाना । बुधि बिबेक बिग्यान निधाना ॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं । जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं ॥ अर्थात ऋक्षराज जाम्बवानजी ने हनुमानजी को उनके असीम-अपार बल का स्मरण कराते हुए कहते है कि हे हनुमान ! हे बलवान ! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रक्खी है ? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो । तुम बुद्धि, विवेक और विज्ञान की खान हो । जगत में कौन-सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात ! तुमसे न हो सके । यह जाम्बवानजी के विश्वास भरे वचन ही थे जिन्होंने हनुमानजी के मनोबल और आत्मबल को जागृत किया और उन्हें अपनी शक्तियों का स्मरण करवाया जिसके कारण अष्ट सिद्धि नौ निधि निधि के दाता श्रीहनुमानजी सीताजी का पता लगाने के लिए चार सौ कोस का समुद्र लाँघ गए । हनुमान चालीसा में तुलसीदास जी लिखते है कि ‘प्रभु मुद्रिका मेली मुख माहीं । जलधि लाँधि गए अचरज नाहीं ।।‘ कहते है कि यदि आप किसी को श्वास नहीं दे सकते तो उसे आस दीजिये । विपदा के समय यही कार्य तब ऋक्षराज जाम्बवानजी ने किया था और आज हमें करने की आवश्यकता है । श्रीरामचरितमानस में गोस्वामी जी लिखते है कि ‘सिंहनाद करि बारहिं बारा । लीलहिं नाघउं जलनिधि खारा ॥ सहित सहाय रावनहि मारी । आनउं इहां त्रिकूट उपारी ॥‘ अर्थात जाम्बवानजी के वचनों को सुनकर हनुमान जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लांघ सकता हूँ और सहायकों सहित रावन को मारकर, त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ । तुलसीदास जी संकटमोचन हनुमान अष्टक में इसी प्रसंग का वर्णन करते हुए लिखते है कि ‘हेरी थके तट सिन्धु सबे तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो । को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥‘ अर्थात जब सारे वानर सीता को ढूँढ़ते ढूँढ़ते थक कर और निराश होकर समुद्र तट पर बैठे थे तब आप ही ने लंका जाकर माता सीता का पता लगाया और सबके प्राणों की रक्षा की । संसार में ऐसा कौन है जो आपके संकटमोचन नाम को नहीं जानता ।

          सार यह है कि रामायणकाल के इस प्रसंग से हमें प्रेरणा और युक्ति मिलती है कि विपदा और निराशा के समय हमें मन में धैर्य धारण करते हुए, किसी की निंदा और आलोचना न करते हुए, किसी को कड़वे वचन न बोलते हुए जाम्बवानजी की तरह आचरण करते हुए स्वयं का एवं दूसरों का मनोबल और आत्मबल को कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए साथ ही साथ निराशा में डूबे अन्य व्यक्ति का भी मनोबल और आत्मबल जागृत करते हुए उसे शक्ति और आशा देते रहना चाहिए तथा हनुमानजी की तरह अपनी शक्तियों को पहचानते हुए संकटमोचन बन एक-दूजे के प्राणों की रक्षा करते रहना चाहिए । जय सियाराम ।
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