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वर्तमान राजनीतिक परिवेश में एक देश एक चुनाव संभव नहीं!

स्वतंत्र पत्रकार
-डाॅ.भरत मिश्र प्राची
लोकसभा आम चुनाव 2019 के बाद देश में मिले जनादेश से प्रोत्साहित गठित केन्द्र में मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी के प्रारम्भ से ही देश में एक देश एक चुनाव की बात जोर – शोर से करने लगी है जिसपर आम सहमति बनाने के लिये सर्वदलीय बैठक भी बुला ली पर इस बैठक में इस बात पर आम सहमति नहीं बन पाई। इस बैठक में 24 राजनीतिक दल पहुंचने की बात सामने आ रही है जिसमें अधिकांश रानीतिक दलों ने अपनी सहमति भी जताई पर देश के प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस, भाजपा के सहयोगी शिवसेना, विपक्ष सपा, बसपा, डीएमके, तेदेपा,टीएमसी, एवं राजद को कोई सदस्य शामिल नहीं हुआ। बैठक में वाम दल के नेता पहुंचे पर इसे संघीय ढाचे के खिलाफ बताते हुये अपनी असहमति जताई।

इस तरह की बात पूर्व में भी केन्द्र सरकार के एनडीए शासन काल में उठी पर आम सहमति नहीं बन पाने के कारण इसपर अमल नहीं हो सका। लोकसभा चुनाव के बाद देश में विधानसभा चुनाव होने है, इस तरह के चुनाव के कार्यकाल भी भी एक साथ नहीं हो सकते। इनमें से कहीे भाजपा की सरकारें है तो कहीें विपक्ष की। जहां विपक्ष की सरकारें है वो कभी भी पूर्व में विधानसभा भंग कर एक साथ चुनाव कराने को तैयार नहीं होगी। आज के बदलते राजनीतिक महौल में राजनीतिक स्थिरता की कौन गांरटी लेगा। जिस कारण देश में पूर्व में एक साथ हो रहे लोकसभा एवं विधानसभ चुनाव अलग – अलग होने लगे। जब तक देश के लोकतंत्र में राजनीतिक स्थिरता का महौल नहीं बनेगा, जब तक हमारा लोकतंत्र माफियातंत्र के परिवेश से अलग नहीं हो पायेगा, जब तक देश के लोकतंत्र से आया राम गया राम की राजनीति खत्म नहीं होगी, जब तक देश के लोकतंत्र से खरीद फरोख्त का परिवेश खत्म नहीं होगा, एक देश एक चुनाव की बात कैसे संभव हो पायेगी ?

एक देश एक चुनाव सुनने में तो अच्छा लगता है। इस तरह का परिवेश निश्चित तौर पर लोकतंत्र एवं देश के हित में है। इस तरह के परिवेश से देश में चुनाव पर हो रहे अनावश्यक खर्च तो कम होंगे ही बेहतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी बहाल होगी जहां सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव को प्रभावित होने वाले चुनावी सर्वेक्षण पर स्वतः रोक लग जाने का परिवेश भी उभर आयेगा। पर देश के वर्तमान राजनीतिक हालात इस तरह के परिवेश के पक्षधर नहीं हो सकते जहां आज हो रहे चुनाव सुरक्षा की दृृष्टि से कई चरणों में हो रहे है। कई राजनीतिक दल उभर आये है ,जिनके अपने-अपने स्वार्थ है। जो एक दूसरे पर अपनी आंखें गड़ाये भी बैठे है, कोई राजनीतिक दल लाभ न उठा ले।
जबकि देश में सन् 1952 से लेकर सन् 1967 तक के लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ होते रहे। सन 1971 में देश में पहली बार लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव कराये गये जिससे लोकसभा एवं विधानसभा एक साथ होने की प्रक्रिया भंग हो गई। देश में आई राजनीतिक अस्थिरता के चलते आज तक एह संभव नहीं हो सका कि लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ हो। इस दिशा में पूर्व में भी चुनावी खर्च को कम करने की दिशा में लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ कराये जाने प्रस्ताव आते रहे । इस परिप्रेक्ष्य में जनवरी 2017 में राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर पूर्व राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जी ने भी चुनाव आयोग को लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की दिशा में सभी राजनीतिक को बुलाकर बातचीत कर महौल बनाने की सलाह अवश्य दी पर आज के स्वार्थ से परिपूर्ण विभिन्न टुकडों में बंटे राजनीतिक दलों से इस तरह के प्रस्ताव पर आम सहमति बन पाना कतई संभव नहीं ।

पूर्व में स्वतंत्रता उपरान्त देश में कई वर्षो तक लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते रहे तब आज जैसी अनेक राजनीतिक पार्टिया नहीं हुआ करती। देश में जैसे-जैसे सत्ता सुख बटोरने की प्रवृृति हावी होती गई, राजनीतिक दलों में माफिया वर्ग का वर्चस्व बढ़ता चला गया। देश में राजनीतिक अस्थिरता का महौल बनने लगा,कई राजनीतिक दल उभर आये जिनमें स्थानीय दलों की प्रमुखता सर्वोपरि बनी रही। इस तरह के उभरे हालात में जनता द्वारा चुनी सरकारें अपना समयकाल से पूर्व ही भंग होने लगी। देश में मघ्यावधि चुनाव की स्थितियां ज्यादा बनने लगी जिससे लोकसभा एवं विधानसभा के चुनाव एक साथ होने की प्रक्रिया स्वतः ही बिखर गई। आज तक देश में वहीं हालात बने हुये है जिसके कारण विधानसभा के चुनाव लोकसभा के साथ संभव नहीं हो पाये। अगर मान भी लिया जाय कि देश में लेाकसभा एवं विधासभा के चुनाव एक साथ कराने की आपसी सहमति बना भी ली जाय तो सŸाा प्राप्ति के प्रति बढती राजनीतिक महत्वाकंक्षा एवं व्याप्त राजनीतिक भ्रष्टाचार के बीच इस बात की गारंटी कौन देगा कि देश में पूर्व जैसे हालात नहीं उभरेंगे जिससे देश में मध्यावधि चुनाव न हो। इस तरह के राजनीतिक परिवेश में एक देश एक चुनाव की बात संभव दिखाई नहीं देती।

केन्द्र की वर्तमान सरकार का अपने पूर्व के कार्यकाल में एक देश एक टैक्स का दिया नारा सुनने में देशवासियों को बहुत अच्छा लगा पर इस नारे पर आधारित जीएसटी आजतक एक देश एक टैक्स का रूप नहीं ले सकी। आज भी देशवासी जीएसटी के साथ- साथ तरह-तरह के टैक्स भार के तले दबे हुये है। एक देश एक टैक्स के नाम से जारी जीएसटी एक टैक्स का रूप नहीं ले सकी। इस सच्चाई को वर्तमान केन्द्र सरकार भी जानती है। इस मामले में कथनी करनी एक जैसी नहीं है। एक देश एक चुनाव की बात भी राजनीतिक प्रेरित है जो लोकतंत्र के लिये बेहतर होते हुये भी वर्तमान राजनीतिक परिवेश में कतई संभव नहीं।

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