Rajasthan Update
Best News For rajasthan

घटते जा रहे रोजगार से चिंतित है श्रमिक वर्ग एवं देश की युवा पीढ़ी!

मई दिवस पर विशेष आलेख
स्वतंत्र पत्रकार
-डॉ. भरत मिश्र प्राची

देश में 17वीं लोकसभा हेतू वर्ष 2019 का चुनाव मई दिवस के बीच से गुजरते हुये सम्पन्न होने जा रहा है जहां की अधिकांश आबादी श्रम पर आधारित है। जहां का अधिकांश जन जीवन दैनिक मजदूरी पर आज भी टिका हुआ है। जहां के अधिकांश घरों के चूल्हें श्रम से मिले वेतन पर आधारित है। देश की युवा पीढ़ी रोजगार के लिये भटक रही है। भूमंडलीयकरण, खुले बाजार नीति एवं उदारीकरण से उपजे सरकार की नई आर्थिक नीतियों के चलते यहां देश में रोजगार देने वाले खड़े उद्योग घीरे – धीरे बंद होते जा रहे है। नये उद्योग आ नहीं रहे है। जिसका प्रतिकूल प्रभाव यहां के श्रमिक वर्ग एवं बेरोजगार युवा पीढ़ी पर सर्वाधिक पड़ा है। देश में अचानक लागू नोटबंदी से कई दैनिक श्रम से जुड़े श्रमिकों के हाथ से रोजगार छीन गया। जीएसटी से बाजार भाव अनियंत्रित हो गया। इस तरह के परिवेश का यहां के श्रमिकों के जनजीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा ।

इस बात को प्रायः सभी जानते है फिर भी इस दिशा में कोई उचित कदम उठाने को आज कोई तैयार दिखाई नहीं दे रहा है। इस दिशा में सभी तुष्टिकरण की नीति अपनाते नजर आ रहे है। किसी भी राजनीतिक दल के घोषणा पत्र में रोजगार देने वाले उद्योग लाने एवं चल रहे उद्योगों को बचाने की बातें कहीे नजर नहीं आती । देश के सभी राजनीतिक दल रोजगार देने की बातें तो कर रहे रहे है पर सही रोजगार कैसे दिया जा सकेगा, इस मुद््दे पर सभी खोखले नजर आ रहे है। वोटों के लिये रेवरियंा बाटी जा रही है पर देश की बेरोजगार युवा पीढ़ी को कैसे रोजगार दिया जा सकेगा, कर्ज से डुबे किसानों को कैसे बाहर किया जा सकेगा, शोषण के बीच दबते जा रहे श्रमिकों को कैसे बाहर निकाला जा सकेगा, असमय श्रम से मुक्त किये जा रहे श्रमिकों की समाजिक सुरक्षा किस प्रकार की जा सकेगी आदि आदि । इस तरह के अनेक गंभीर मुद््दे है जो दिन पर दिन नई आर्थिक नीतियों के बीच उलझ कर जटिल होते जा रहे है। इस दिशा में न तो सरकार कोई सही समाधान निकाल पा रही है न श्रमिकों के हित के लिये बने अलग अलग खेमें में बंटे श्रमिक संगठन।

नई आर्थिक नीतियों के तहत उपजी विनिवेश प्रक्रिया में पनपे निजीकरण के दौर ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के नाम देश के लाखों लोगों को बेरोजगार बना दिया। इस प्रक्रिया के तहत उद्योगों में रिक्त स्थानों की पूर्ति नई भर्ती के द्वारा न करके ठेकेदारों के माध्यम से की जाने लगी, जहां निजीकरण का एक नया अव्यवस्थित स्वरूप सामने उभरता साफ-साफ दिखाई देने लगा । जहां बार-बार विनिवेश एवं निजीकरण के उभरे विरोधी स्वर भी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति पर लगाम नहीं लगा पाये । जिसके कारण निजीकरण के बढ़ते चरण को रोक पाना मुश्किल हो गया। निजीकरण व विनिवेश के विरोधी स्वर के चलते पूंजीपति समर्थक नई आर्थिक नीतियों की पक्षधर सरकार ने ठेकादारी पद्धति के माध्यम से निजीकरण व विनिवेश के पग पसारने का एक नया मार्ग ढूंढ लिया है। जिसके विकराल स्वरूप को वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्रों के उद्योगांे में साफ-साफ देखा जा सकता है। इस तरह के बदले स्वरूप में निजीकरण का लक्ष्य भी पूरा होता दिखाई दे रहा है तथा लूट का बाजार भी चालू है जहां दोहरे लाभ की तस्वीर साफ-साफ उभरती नजर आ रही है। ठेकेदारी प्रथा के चंगुल में पनपता निजीकरण का यह छद्म स्वरूप निजीकरण से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है।

जहां अस्थिरता एवं असंतोष से भरा भविष्य पहले से ही परिलक्षित हो रहा है। ऐसे माहैल में न तो श्रम का कोई मूल्यांकन है, न श्रम से जुड़े लोगों की कोई सुरक्षा। इस तरह के प्रसंगों का कोई कहीं स्थान नहीं। सबकुछ ठेकेदार के हाथ होता है। शोषणीय परिवेश में खाना और खिलाना जहां खुलकर भ्रष्टाचार एवं शोषण का नंगा नाच ही केवल संभव है। इस तरह के परिवेश का इतिहास गवाह है फिर भी निजीकरण के बदले स्वरूप को रोके जाने का यहां कोई विरोध नहीं दिखाई देता। निश्चित तौर पर आने वाले समय में निजीकरण का बढ़ता यह छद्म रूप निजीकरण से भी ज्यादा घातक साबित हो सकता है। इस तरह के उभरे परिवेश का भी श्रमिक वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता नजर आ रहा है।

देश की अधिकांश जनता मध्यमवर्गीय है। जो रोजगार पर टिकी है। रोजगार नहीं मिलने या छीन जाने पर उसकी मनोदशा कैसी हो सकती है, सहज अनुमान लगाया जा सकता है। इस दौर मे श्रमिकों पर हो रहे शोषण से बचाव किये जाने की अपेक्षाएं सरकार से है ं। सरकार का भी दायित्व होता है कि संकट के दौरान उसकी रक्षा करे जिसके हित के निमित्त उसका स्वरुप परिलक्षित होता है। पूंजीवादी व्यवस्था से उपजी नई आर्थिक नीति की जो देन उसका शिकार यहां का हर मध्यमवर्गीय परिवार हो रहा है। मंहगाई आज दोनों ही भारत जैैसे विकसित देश के लिये घातक है। इस तरह के परिवेश से निजात पाने का मार्ग प्रशस्त आमजन द्वारा गठित सरकार को ही करना होगा तभी उसका स्वरुप साकार हो सकेगा।

देश में हो रहे लोकसभा चुनाव सम्पन्न हो जायेंगे । नई सरकार भी गठित हो जायेगी । पर आने वाली नई सरकार क्या बेराजगार युवा पीढ़ी को रोजगार देने के उपयुक्त संसाधन उपलब्ध करा पायेगी ,श्रमिकों पर उमड़ रहे संकट के बादल से मुक्ति दिला पायेगी या चुनाव जीतने के लिये केवल मुफ्त रेवरियां ही बांटती रहेगी । इस पर मंथन करने की आवश्यकता है।

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More