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चुनाव में प्रभावी जातीय समीकरण आकंलन गणित को गड़बड़ा सकता !

स्वतंत्र पत्रकार
-डाॅ. भरत मिश्र प्राची

इस बार के लोकसभा चुनाव में मुख्य रूप से प्रभावी हो रहा जातीय समीकरण चुनावी गणित को गडबड़ा सकता है। जो मीडिया में इस बार मोदी मोदी की गूंज सुनाई दे रही है, इस गूंज के परिणाम को चुनाव में उभरता जातीय समीकरण उलटफेर कर सकता है। लोकसभा के अब तक हुये चुनाव में चुनाव के दौरान हुये मतदान के कम आकड़े सत्ता परिवर्तन की ओर इंगित कर रहे है जिसे यहां का चुनावी गणित अभी नकारता नजर आ रहा है। इस बार के चुनाव में सत्ता पक्ष के खिलाफ विपक्ष सही ढंग से लामबद्ध नजर तो नहीं आ रहा पर सत्ता पक्ष के कार्यकाल की विफलतांए चुनाव को प्रभावित अवश्य कर रही है।

देश के विभिन्न भागों से आ रहे इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधिकांश चैनलों में मोदी लहर होने के परिवेश को बार-बार उजागर किया जा रहा है जब कि सतही धरातल पर वस्तु स्थिति कुछ और ही नजर आ रही है। यदि इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधिकांश चैनलों में जहां जिस प्रकार से मोदी के प्रति उमड़े जनसलाब की बातें सामने आ रही है, उसके अनुसार तो इस लोकसभा चुनाव 2019 में वर्तमान सत्ता पक्ष की सीटें गत लोकसभा चुनाव 2014 से अधिक आनी चाहिए पर वास्तविक तौर पर ऐसा कुछ भी नहीं । वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन की एक लहर चली थी जो सही मायनें में इस लोकसभा चुनाव में कहीं से कोई लहर नजर नहीं आ रही है।

लोकसभा चुनाव 2014 के बाद देश भर में इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधिकांश चैनलों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की लहर को मोदी लहर में तब्दील कर दिया गया। आज भी इस तरह के परिवेश को बढ़ा चढ़ाकर आमजनमानस के सामने इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधिकांश चैनल प्रचार-प्रसार में लगे हुये है। इस बात का उजागर देश के अधिकांश भाग मे भी नजर आने लगा है जहां अब इलेक्ट्रानिक मीडिया भी संदेह के दायरे में आने लगी है। इलेक्ट्रानिक मीडिया पर भी आमजन के बीच विरोधी आवाजें आनी शुरू हो गई है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि द्वारा आमजन के बीच पूछे गये प्रश्नों पर एकतरफा होने के भी संदेह उजागर होने लगे है। जहां कहीं कहीं आमजन इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि से पूछते नजर आ रहा है कि आप मोदी के आदमी तो नहीं है। इस तरह के उभरते परिवेश मीडिया की कार्यशैली की निष्पक्षता पर सवाल निश्चित तौर पर करते नजर आ रहे है।

चुनाव दौरान इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधि द्वारा आमजन के बीच जाकर उसके मत के बारे जानकारी हासिल करने की प्रक्रिया भी चुनावी प्रक्रिया के विपरीत मान जा सकती है जहां वोट की प्रक्रिया गुप्तमतदान द्वारा की जा रही हो वहां मतदाता से यह जानने का प्रयास की वोट किसे दिया जा रहा है, पूर्णतः अवैध है पर इलेक्ट्रानिक मीडिया के मंच पर यह बात आज सामान्य सी हो गई है। जिसपर चुनाव आयेोग को मंथन करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में एक और तथ्य उभर कर सामने आ रहा है, जहां चुनाव पूर्व मीडिया में आंकलन दिये जा रहे है, इस तरह के आंकलन निश्चित तौर पर किसी न किसी राजनीतिक दल के प्रभाव से प्रभावित होते जो जो चुनाव में आमजनमानस को भटकाने का काम करते है।

इस तरह के परिवेश जिस पर पूर्व में चुनाव आयोग ने चुनाव दौरान किये जा रहे किसी भी प्रकार के सर्वेक्षण, प्रसारण पर प्रतिबंध लगाये थे, खुलकर उजागर होने लगे है। जिससे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया बाधित होती है। जब तक चुनावी प्रक्रिया समाप्त नहीं हो जाती, किसी भी तरह का चुनावी सर्वेक्षण एवं प्रसारण किया जाना निष्पक्ष चुनाव की दृृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता ।

इस बार के लोकसभा चुनाव को देश की इलेक्ट्रानिक मीडिया भले ही जिस नजर से आंक रही हो पर किसी के पक्ष में पूर्व की भाॅति कोई लहर नहीं है। इस चुनाव में जातीय समीकरण विशेष रूप से प्रभावित नजर आ रहा है। विपक्ष में आपसी गठबंधन होने से जातीय आधारित वोटों का एकजगह ध्रुवीकरण होना सत्ता पक्ष को नुकसान पहुंचा सकता है। इस तरह के हालात प्रायः देश के सर्वाधिक मतदाता वाले क्षेत्र को प्रभावित कर रहे है जहां जातीय समीकरण चुनावी गणित को गड़बड़ा सकता है। इस तरह के उभरते परिवेश को नकारा नहीं जा सकता जहां राजनीतिक दल आज भी अपने प्रतिनिधियों के चयन में जातीय समीकरण को आगे कर निर्णय लेते हेै।
देश के कई भागों में आमने – सामने तो कई भागों में त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। अभी हाल ही में हुये विधानसभा चुनाव में हुये सत्ता परिवर्तन के उभरते परिवेश भी लोकसभा 2014 में सत्ता पक्ष को प्राप्त सीटों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते है।

वर्तमान केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियों के प्रतिकूल प्रभाव भी चुनाव 2019 को प्रभावित कर सकते है। इस तरह इस बार जातीय समीकरण से प्रभावित हो रहे लोकसभा चुनाव 2019 की स्थिति लोकसभा 2014 की तरह तो नहीं होगी, प्रायः इस तथ्य को आंतरिक मन से सभी मानने तो लगे है पर चूनावी महौल बनाने की दिशा में अपने अपने तरीके से सभी इलेक्ट्रानिक मीडिया का सहारा लेते नजर आ रहे हे। इस दिशा में सत्ता पक्ष सर्वाधिक रूप से सक्रिय दिखाई दे रहा है। चुनाव उपरान्त ही इलेक्ट्रानिक मीडिया की प्रदर्शित भूमिका के आंकलन का सही मूल्यांकन हो पायेगा ।

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