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झुंझुनूं क्षेत्र में पेयजल… नहर…. बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है इस चुनाव में

रमेश सर्राफ धमोरा
स्वतंत्र पत्रकार

देशभर में सैनिकों के जिले के नाम से पहचाने जाने वाले राजस्थान के झुंझुनूं लोकसभा क्षेत्र की इस भूमि पर अधिकतर समय कांग्रेस का ही कब्जा रहा है। बीच-बीच में कांग्रेस विरोधी दलो ने यहां हाथ पैर मारने की कोशिश जरूर की, लेकिन उसे उतनी सफलता नहीं मिल पाई। गांव -ढाणी में शहीदों की मूर्तियों वाले इस जिले की राजनीति में पांच दशक तक तक कांग्रेस के दिग्गज नेता शीशराम ओला का वर्चस्व रहा है।

हरियाणा राज्य की सीमा से सटे इस लोकसभा क्षेत्र में झुंझुनूं जिले की सात विधानसभा क्षेत्रों झुंझुनू, खेतड़ी, मंडावा, सूरजगढ़, पिलानी उदयपुरवाटी और नवलगढ़ व सीकर जिले का फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र शामिल है। आठ विधानसभा क्षेत्रों से मिलकर बनने वाले इस लोकसभा क्षेत्र से वर्तमान में बीजेपी की संतोष अहलावत सांसद हैं। झुंझुनूं लोकसभा क्षेत्र में कुल 19 लाख 8 हजार 887 मतदाता है। जिनमे 10 लाख 15 हजार 894 पुरुष मतदाता व 9 लाख 8 हजार 400 महिला मतदाता है।  इनमे 26 हजार 527 सर्विस वोटर्स शामिल हैं। तीसरे लिंग का भी एक मतदाता हैं।

झुंझुनूं लोकसभा क्षेत्र में सर्वाधिक जाट जाति के मतदाताओं का बोलबाला है। वहीं दूसरे स्थान पर अनुसूचित जाति, तीसरे स्थान पर मुस्लिम समुदाय के मतदाता है। फिर सैनी व राजपूत, ब्राम्हण, गुर्जर,यादव,बनिये व जातियो के मतदाता है। सैनी समुदाय से पूर्व में मदनलाल सैनी,मातुराम सैनी व उप जिला प्रमुख बनवारी लाल सैनी भाजपा से चुनाव लड़ चुके हैं मगर कोई भी जीता नहीं। झुंझुनूं लोकसभा सीट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। यहां भाजपा ने पहली दफा 2014 के चुनाव में मोदी लहर के चलते ही अपना खाता खोल पाई थी। अब तक सम्पन्न हुये 16 लोकसभा चुनाव में से दस बार कांग्रेस व 6 बार विरोधी दलो के प्रत्याशी जीत चुके हैं।

झुंझुनू से मुख्य मुकाबला भाजपा के नरेन्द्र खीचड़ व कांग्रेस के श्रवण कुमार के मध्य है। दोनो ही दलो के प्रत्याशी जाट जाति के हैं व राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। दोनो ही अपनी -अपनी जरत के लिये पूरा दम लगा रहें हैं व गांव-गांव घूमकर प्रचार कर रहे हैं। भाजपा को मोदी के नाम व काम का सहारा है तो कांग्रेस को प्रदेश में सरकार होने का लाभ मिल रहा है। जिले में सेना से जुड़े लोगो की काफी तादाद होने से भाजपा प्रत्याशी का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।

झुंझुनूं के चुनावी इतिहास में 1951 के पहले आम चुनाव में कांग्रेस के राधेश्याम आर मोरारका ने भाकपा के कामरेड घासीराम को हराया था। 1957 में कांग्रेस के राधेश्याम आर मोरारका ने भाकपा के कामरेड घासीराम को 11 हजार 999 मतो से हरा दिया था। कांग्रेस के मोरारका को 77 हजार 478 वोट व भाकपा को 65 हजार479 वोट मिले थे। 1962 के चुनाव में कांग्रेस के राधेश्याम आर मोरारका 81 हजार 51 वोट लेकर लगातार तीसरी बार सांसद बने। उन्होने स्वतंत्र पार्टी के ठाकुर रघुबीर सिंह बिसाऊ को 3 हजार 460 वोटो से हरा दिया। रघुबीर सिंह को 77 हजार 591 वोट मिले थे। 1967 के लोकसभा चुनाव में यहां से पहली बार कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस के राधेश्याम आर मोरारका को स्वतंत्र पार्टी के आरके बिड़ला ने 46 हजार 573 वोटो से हरा दिया। बिड़ला को एक लाख 50 हजार596 वोट मिले व कांग्रेस प्रत्याशी को एक लाख चार हजार 23 वोट मिले थे। 1971 में कांग्रेस के शिवनाथ सिंह गिल ने स्वतंत्र पार्टी के कृष्ण कुमार बिड़ला को 98हजार 949 वोटो से हराया था। कृष्ण कुमार बिड़ला उस समय देश के बड़े उद्योगपति थे। कांग्रेस को दो लाख 23 हजार 286 वोट व बिड़ला को एक लाख 24 हजार337 वोट मिले थे।

1977 में जनता पार्टी की लहर में जनता पार्टी के कन्हैयालाल महला ने (भारतीय लोकदल) कांग्रेस के शिवनाथ सिंह गिल को एक लाख 26 हजार 951 वोटो से हराया। महला को दो लाख 33 हजार 734 वोट व गिल को एक लाख छ हजार 783 वोट मिले थे।

1980 में जनता पार्टी के ठाकुर भीमसिंह मण्डावा ने कांग्रेस अर्स की सुमित्रा सिंह को सात हजार 892 वोटो से हरा दिया। भीमसिंह को एक लाख 43 हजार 448 वोट मिले थे जबकि सुमित्रा सिंह को एक लाख 35 हजार 556 वोट मिले थे। 1984 में कांग्रेस के कैप्टन अयूब खान ने लोकदल की सुमित्रा सिंह को 57 हजार 306 वोटो से हरा दिया। अयूब खान को दो लाख 61 हजार 152 वोट व सुमित्रा सिंह को दो लाख  तीन हजार 846 वोट मिले थे। 1989 में जनता दल के जगदीप धनखड़ ने कांग्रेस के कैप्टन अयूब खान को एक लाख 61 हजार 981 वोटो के बड़े अन्तर से हराया था। धनखड़ को चार लाख 21 हजार 686 वोट व अयूब खान को दो लाख59 हजार 705 वोट मिले।

1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कैप्टन अयूब खान ने भाजपा के मदनलाल सैनी को 20 हजार 254 वोओ से हराया था। अयूब खान को दो लाख 13 हजार903 वोट व सैनी को एक लाख 93 हजार 649 वोट मिले थे।

1996 में जाटो के बड़े नेता शीशराम ओला ने कांग्रेस टिकट नहीं मिलने पर पार्टी से बगावत कर कांग्रेस (तिवाड़ी) से चुनाव लडक़र बीजेपी के मातूराम सैनी को हराया था। इस चुनाव में ओला को 2,70,489 और मातूराम सैनी को 2,57,250 मत मिले थे। 1998 में शीशराम ओला ने 3,38,526 मत लेकर कांग्रेस का परचम लहराया था। इस चुनाव में उनके सामने बीजेपी के मदनलाल सैनी थे। सैनी को 3,00,667 मत मिले थे।

1999 के चुनाव में शीशराम ओला ही यहां से सांसद चुने गए थे। इस चुनाव में ओला ने 3,30,198 मत लेकर भाजपा के बनवारीलाल सैनी को हराया था। सैनी को2,53,850 वोट मिले थे। 2004 में कांग्रेस के शीशराम ओला ने यहां जीत दर्ज कराई थी। इस चुनाव में ओला को 2,74,168 वोट मिले थे। उनके सामने चुनाव मैदान में डटी बीजेपी की संतोष अहलावत को 2,50,813 मत मिले थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के शीशराम ओला ने बीजेपी के दशरथ सिंह शेखावत को हराया था। इस चुनाव में ओला ने 3,06,330 मत प्राप्त किए थे। जबकि दशरथ सिंह शेखावत को 2,40,999 मत मिले थे।

2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व शीशराम ओला की मृत्यु होने पर कांग्रेस ने उनकी पुत्रवधू व पूर्व जिला प्रमुख डा.राजबाला ओला को मैदान में उतारा था। भाजपा ने उनके सामने 2004 के चुनाव में शीशराम ओला का मुकाबला कर हार चुकी चुकी संतोष अहलावत को मैदान में उतारा। भाजपा प्रत्याशी संतोष अहलावत को 488182वोट मत हासिल हुए थे वहीं कांग्रेस प्रत्याशी राजबाला ओला को 254347 मतो से संतोष करना पड़ा था। भाजपा की अहलावत ने कांग्रेस की डा.राजबाला ओला को233835 मतो के बड़े अन्तर से हराया था।

झुंझुनूं लोकसभा क्षेत्र के मुद्दों की बात की जाए तो जिले में बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। रोजगार का कोई साधन नहीं हैं। यहां सिंचाई के लिये नहर, पेयजल, बड़ी रेल लाइन पर दिल्ली- जयपुर  व देश के अन्य स्थानो के लिये नियमित रेल सेवा, मेडीकल कालेज, हवाई अड्डे का विस्तार करना मुद्दा बनकर छाया रहता है। चाहे कांग्रेस हो या फिर बीजेपी सभी पार्टियां हर बार क्षेत्र की जनता को चुनावी वादों का दिवास्वप्न दिखा कर वोट लेकर जीत तो जाती है मगर आम मतदाता की मूलभूत सुविधाओं की मांग पर भी गौर करने का समय नहीं निकाल पाती हैं।

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