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बाल मन को बीमार करता डिप्रेशन

बचपन को निगलने के लिए आज की शिक्षा प्रणाली, फ़ास्ट-फ़ूड, मोटापा सहित अन्य शारीरिक और मानसिक कारण तो विद्यमान है ही मगर अब डिप्रेशन का खतरा भी बच्चों पर मंडराने लगा है । माता-पिता की अपेक्षाएं परीक्षा में असफलता और मानसिक समस्याएँ जैसे कई कारण है, जिन्हें बच्चे अकेले झेलते है । अभिभावक सावधान और सतर्क नहीं हुए तो बालमन को डिप्रेशन के खतरे से बचाना मुश्किल हो जायेगा । विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2017 में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 13-15 वर्ष की आयु के 4 बच्चों में से लगभग एक बच्चा डिप्रेशन से ग्रस्त है । यानी कि  किशोर अवस्था के अपने शुरुवाती सफ़र से ही 25 फीसदी भारतीय बच्चे डिप्रेशन से ग्रस्त है । विशेषज्ञों के एक अनुमान के मुताबिक राजस्थान में 6-14 वर्ष की आयु के लगभग 1 लाख से अधिक बच्चे डिप्रेशन की गिरफ्त है । इन रिपोर्ट्स और अनुमान से एक बात का पता तो साफ़ तौर पर चलता है कि हम अपने बच्चों को एक ऐसा वातावरण दे रहे है जिसमे वो सुरक्षित और सहज नहीं है । हँसता-खेलता बचपन अकेलेपन, निराशा और अवसाद के भँवर में डूबता जा रहा है और अपने-अपने बच्चों के जीवन को सुधारने में लगे हम लोग असल में बच्चों पर ही सही से ध्यान नहीं दे पा रहे है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2011 से 2015 के बीच 14 वर्ष तक आयु के 11 हजार से अधिक बच्चों ने अपनी जीवन लीला स्वयं समाप्त कर ली । क्या बच्चों की दर्दनाक मौत के ये आंकड़ें हमारी अंतर आत्मा को झकझोर देने के लिए काफी नहीं है ? आखिर किस और हम अपना और अपने बच्चों का जीवन ले जाना चाहते है ? वो ऐसी कौनसी अदृश्य शक्ति है जिसको पाने के लिए सभी रात-दिन दौड़े जा रहे है ? और बच्चों के साथ समय बीताने के लिए समय तक नहीं निकाल पा रहे है । मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार कम से कम 50 प्रतिशत मानसिक परेशानियां 14 वर्ष से कम उम्र तक की उम्र में दिखाई दे जाती है, जरुरत है तो सिर्फ लक्षणों को पहचानने और सही समय पर सही उपचार करवाने की । बच्चों के माता-पिता को यह समझाना होगा की मनोरोग का मतलब सिर्फ पागलपन नहीं होता।

हालाँकि  पहले की तुलना में अभिभावक डिप्रेशन से ग्रस्त बच्चों के उपचार के प्रति गंभीर हुए हैं लेकिन यह भी सही है कि अभिभावक नहीं जानते कि बच्चों में निराशा घर कर रही है। बच्चों की मानसिक समस्याओं के पीछे जैविक, मानसिक व सामाजिक तीनों ही कारणों की भूमिका देखने को मिलती है । जैविक कारणों में आनुवंशिक व परिवार में किसी अन्य सदस्य को डिप्रेशन होने जैसे कारण आते हैं । मनोवैज्ञानिक कारणों में, बच्चा स्वयं के बारे में क्या सोचता है, आस-पास घटित होने वाली घटना व परिस्थिति का बच्चे पर क्या असर पड़ता है आदि और सामाजिक कारणों में समाजिक संगत और स्कूल से बाहर के परिवेश का असर शामिल होता है । अशांति और भय का माहौल भी बच्चों की मानसिक स्थिति पर बुरा असर डालता है । बच्चों में डिप्रेशन के प्रमुख कारणों में अभिभावकों की अत्यधिक अपेक्षाएं,  माता-पिता में आपसी मतभेद, अलगाव, पढ़ाई का दबाव, स्कूल में बदलाव, दोस्तों से लड़ाई, यौन उत्पीड़न और दूसरे बच्चों द्वारा चिढ़ाया जाना प्रमुख रूप से शामिल होते है । अभिभावकों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि छोटे और बड़े बच्चों में डिप्रेशन के लक्षण अलग-अलग होते हैं । यदि बच्चे के मूड में तेजी से उतार-चढ़ाव आ रहे है, वह बात-बात पर बहुत गुस्सा कर रहा है,

अकारण पेट दर्द व अन्य परेशानियों की बात कर रहा है, दूसरों के साथ घुलता-मिलता नहीं है, स्कूल जाने से बार-बार मना कर रहा है, चुपचाप रहता है, डरता है,  उदास गाने सुन रहा है, उसके खाने-पीने या नींद की प्रक्रिया के तौर-तरीकों में बदलाव देखने को मिल रहे हो और ये लक्षण लगातार दो सप्ताह से ज्यादा समय से दिखाई दे रहे हो तो हो सकता है बच्चा अवसाद से ग्रस्त हो, ऐसे में उसके साथ दोस्ताना व्यव्हार करें, उनके साथ नम्रता से पेश आये,  बच्चों को अपनी भावनाएं खुल कर व्यक्त करने के लिए प्रेरित करें । इस दौरान उनकी बातों की आलोचना न करें या फिर अपने निर्णय उस पर न थोपें । आवश्यकता पड़ने पर काउंसलर अथवा मनोरोग विशेषज्ञ से भी परामर्श लेना चाहिए । माता-पिता को एक ओर बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हो सकता है डिप्रेशन का उपचार लम्बे समय तक चले ऐसे में डॉक्टर से तुरंत समाधान की मांग न करें और संयम बनाये रखे और यदि इस दौरान उन्हें स्वयं को काउन्सलिंग की जरूरत महसूस हो तो तुरंत प्रभाव से उन्हें भी प्रशिक्षित  काउंसलर से सलाह लेने से हिचकिचाना नहीं चाहिए ।  इससे समय रहते बड़ी अनहोनी को टाला जा सकता है । यकीन मानिए यदि हमारे बच्चे आज स्वस्थ है तो देश सदैव सुरक्षित और समृद्ध रहेगा ।

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