वोट के लिये ओछी राजनीति लोकतंत्र के लिये घातक !

डॉ.भरत मिश्र प्राची

स्वतंत्र पत्रकार

देश में 17वीं लोकसभा गठन हेतू वर्ष 2019 में हो रहे आम चुनाव वोट के लिये की जा रही ओछी राजनीति लोकतंत्र के लिये घातक साबित हो सकती हे। इस बार लोकसभा चुनाव में मुद्दे की बात न कर आमजनमानस को भरमाने के लिये दबे मुद्दे उभारने का कार्य जिस स्तर पर जारी है, स्वस्थ लोकतंत्र के लिये कदापि सही नहीं माना जा सकता । सन् 1984 में घटित घटना के पीछे निश्चित तौर पर राजनीतिक पृष्ठभूमि हो सकती है जिसे राजनीति में लाभ लेने वाले अपने आपको ज्यादा शुभचिंतक की पृष्ठिभूमि उभारकर इस तरह के अमानवीय कारनामें को इल्जाम दे दिये हों, जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता पर राजनीतिक विरासत में इस तरह की बात होना आम बात है जहां इस तरह के परिवेश में शामिल लोगों का स्वार्थ समाया होता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के रक्षकों द्वारा गोली दागकर की गई हत्या में शामिल वर्ग के आधार पर उससे जुडे वर्ग के सभी लोगों पर किया गया आक्रमण यथोचित नहीं है जिसे हवा देने वालों को दंड मिलना ही चाहिए पर उस समय की घटना को बार – बार नरसंहार की संज्ञा से संबोधित करते हुये मीडिया में दबे घाव को उभारने का कार्य नहीं किया जाना चाहिए। जो लोग इस दर्द को अब तक भूल चुके है, ऐसे लोगों को किसी को राजनीति लाभ दिलाने के उदेश्य से मीडिया के सामने लाकर खड़ा किया जाना एवं आमचुनाव के दौरान इस तरह की घटना को उकसाना ओछी राजनीति है जिससे साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थिति बिगड़ सकती है ।

देश की वर्षो गुलामी से मिली आजादी के बाद स्थापित लोकतंत्र में धीरे – धीरे जब से माफियाओं एवं अपराधिक प्रवर्ति से जुड़ें लोगों का वर्चस्व बढ़ता गया जिसके कारण आज लोकतंत्र की दशा व दिशा ही बदल गई है । आज हर राजनीतिक दल इस तरह के परिवेश से अछूते नहीं रह गये है। इस बार के लोकसभा चुनाव में आकड़े के अनुसार सबसे ज्यादा अपराघी एवं करोडपति प्रतिनिधि सत्ताधारी दल के पास ही है। इस तरह लोगों के जनप्रतिनिधि बनने से देश से भ्रष्टाचार कैसे मुक्त हो सकेगा । फिर इस तरह के परिवेश से जुड़े रहने के वावयूद चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाया जाना, आमजनमानस को गुमराह करने के सिवाय कुछ और नहीं है। इस तरह के परिवेश पर चर्चा करने से पूर्व अपने आप को दागी परिवेश से दूर कर चर्चा करना यर्थाथ माना जा सकता है। वरना जिस कारण आज देश में हर शासनकाल में भ्रष्टाचार उजागर होते रहे है और आज भी हो रहे है। इस तरह के परिवेश पर रोक लगने के वावयूद चुनाव में वोट के लिये इस तरह के मुदृदे को उछालना ओछी राजनीति है।इस बार के लोकसभा चुनाव में कई बातें पूर्व आम चुनाव से अलग देखने को मिल रही है। आम चुनाव के दौरान चुनाव सम्पन्न होने से पूर्व किसी भी तरह के सर्वेक्षण किये जाने पर रोक चुनाव आयोग द्वारा पूर्व में लगाई जाती रही है पर इस बार आमचुनाव होने के दौरान सर्वेक्षण खुले रूप से देखने को मिल रहा है जो चुनाव को प्रभावित कर सकता है। चुनाव के दौरान किसी के मत जानने एवं पूछना चुनाव प्रक्रिया के विरूद्ध है पर इस बार के चुनाव में खुले तौर पर मीडिया के जनप्रतिनिधियों द्वारा आम मतदाताओं से मत अर्थात वोट के बारे में जानकारी ही केवल नहीं ली जा रही बल्कि उसकी जाति भी पूछी जा रही है जो चुनाव प्रक्रिया के खिलाफ है पर चुनाव आयोग इस तरह के मामले पर मौन है आखिर क्यों ?

आम लोकसभा चुनाव के बाद भले ही किसी की सरकार गठित हो पर जब तक लोकतंत्र की परिधि से देश के माफिया बाहर नहीं होंगे, किसी भी कीमत पर देश में हो रहे भ्रष्टाचार से देश को मुक्ति नहीं मिल सकती फिर अपने को सही और दूसरे को भ्रष्टाचारी कहना बेइमानी ही मानी जा सकती है। आज के परिवेश में कोई किसी से कम नहीं और सभी के सभी राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिये अपने साथ माफियाओं को शामिल किये हुये है। जिनके चलते सभी के शासन में भ्रष्टाचार हो रहे है। इस मामले में सता पक्ष के अपराध उजागर नहीं हो पाते एवं चुनाव के दौरान आमजनमानस को भरमाने के लिये विपक्ष को इस मामले पर घेरने का कार्य सता पक्ष द्वारा किया जाता रहा है जो आज भी हो रहा है। इस तरह की राजनीति ओछी कही जा सकती जिससे लोकतंत्र कभी भी सही रूप नहीं ले सकता।आज देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिनकी इज्जत पूरा देश करता है, आम चुनाव में अपनी पार्टी को बहुमत दिलाने के लिये जिस तरीके से दबे मुद्दे को उभारकर विपक्ष पर प्रहार करते जा रहे है, लोकतंत्र के सर्वोपरि पद पर बैठे व्यक्ति को शोभा नहीं देता । इस तरह के मुद्दे को उभरने के वजाय अपने कार्यकाल में किये कार्यो को आमजनमानस में उभारते तो उनकी लोकप्रियता और ज्यादा बढ़ती। पर इस तरह के परिवेश से भले वे फिर से सता तक पहुच जाएं पर विवादों से मुक्त नहीं हो पायेंगे। आम चुनाव के दौरान वोट पाने के लिये की जा रही राजनीति कभी भी लोकतंत्र के हित में नहीं हो सकती। इस बात को लोकतंत्र के सर्वोपरि पद पर आसीन को समझना चाहिए।

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